मुंबई, 12 जून (वार्ता) बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले के आरोपी एवं कथित माओवादी कार्यकर्ता कवि पी. वरवर राव की उस याचिका पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को नोटिस जारी किया, जिसमें उन्होंने मुंबई से हैदराबाद स्थायी रूप से रहने के लिए जाने की अनुमति मांगी है।
न्यायाधीश अजय गडकरी और न्यायाधीश कमल खाता की खंड पीठ ने एनआईए को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई दो हफ़्ते बाद तय की।
श्री राव (85) को 2018 में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मार्च 2021 में उन्हें चिकित्सकीय आधार पर छह महीने की अस्थायी ज़मानत दी थी। बाद में उच्चतम न्यायालय ने अगस्त 2022 में उन्हें मेडिकल आधार पर ज़मानत दे दी। हालाँकि, ज़मानत की एक शर्त के तहत उन्हें अनुमति के बिना मुंबई की विशेष एनआईए अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की मनाही है।
श्री राव ने अपनी अर्ज़ी में कहा कि मुंबई में रहना आर्थिक और शारीरिक रूप से मुश्किल हो गया है। उनकी पेंशन लगभग 50,000 रुपये है, जबकि महीने का खर्च 77,000 रुपये से ज़्यादा है। उन्होंने पांच साल में छह बार घर बदलने से हुए शारीरिक और मानसिक तनाव का भी ज़िक्र किया, क्योंकि मकान मालिक आपराधिक मामले का हवाला देकर घर देने से मना कर देते थे। उन्हें और उनकी 76 साल की पत्नी को परिवार वालों की मदद की ज़रूरत है, जो सभी हैदराबाद में रहते हैं, जहाँ उनका अपना घर है। उनकी पुत्री और पोती वहाँ चिकित्सकीय पेशेवर हैं।
विशेष एनआईए अदालत ने ने 16 मार्च को उनकी अर्ज़ी खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा कि शीर्ष अदालत ने 2022 में हैदराबाद जाने की जो इजाज़त दी थी, वह अस्थायी थी और उससे स्थायी रूप से वहाँ रहने की अनुमति नहीं मिलती। यह मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से जुड़ा है। पुलिस का कहना है कि इन भाषणों की वजह से अगले दिन कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़क गई, जिसमें एक युवक की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। पुणे पुलिस ने शुरू में माओवादियों से संबंधों की जांच की थी, बाद में यह जांच एनआईए को सौंप दी गयी।
