
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया कि दस्तावेज की सत्यता का परीक्षण सक्षम संस्थान द्वारा किया जा चुका है और वह फर्जी पाया गया है। ऐसे में याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देने से भी कोई व्यावहारिक परिणाम नहीं होगा। यदि आपराधिक प्रकरण दर्ज होता है तो याचिकाकर्ता कानून के अनुसार अग्रिम जमानत सहित अन्य वैधानिक उपाय अपनाने स्वतंत्र है। उक्त मत के साथ न्यायालय ने दायर याचिका खारिज कर दी।
यह मामला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भर्ती में कथित फर्जी 12 वीं की अंकसूची प्रस्तुत करने के आरोप से जुड़ा था। न्यायालय ने कहा कि संबंधित संस्थान के सत्यापन में दस्तावेज जारी ही नहीं होना पाया गया है, ऐसे में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल टीकमगढ़ जिले की ममता यादव ने याचिका दायर कर 26 मई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अधिकारियों को उनके खिलाफ सात दिन के भीतर एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिये गये थे। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बिना सुनवाई का अवसर दिए और बिना विधिवत जांच किए यह कार्रवाई की गई है। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से बताया गया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पद के लिए आवेदन के साथ प्रस्तुत 12वीं की अंकसूची का सत्यापन कराया गया था। संबंधित संस्थान महार्षि पतंजलि संस्कृत संस्थानम ने स्पष्ट किया कि संलग्न अंकसूची उसके द्वारा जारी नहीं की गई है। जिसके बाद न्यायालय ने उक्त निर्देश दिये।
