नितेश कुमार मिश्रा नर्मदापुरम/पिपरिया, उप
जेल पिपरिया एक बार फिर गंभीर आरोपों को लेकर सुर्खियों में है. जेल से रिहा हुए युवक बृजेश गोस्वामी ने जेल में मारपीट, अवैध वसूली और धार्मिक आस्था का अपमान करने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं. युवक का दावा है कि उससे 20 हजार रुपये की मांग की गई और तिलक लगाने से रोका गया. पैसे नहीं देने पर कथित रूप से अन्य बंदियों से पकड़वाकर उसके साथ मारपीट की गई. बृजेश ने अपने शरीर पर चोटों के निशान दिखाते हुए कहा कि उसने उपचार के लिए अस्पताल का भी रुख किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.
युवक का आरोप है कि जेल के भीतर हर सुविधा के लिए पैसों की मांग की जाती है. गुटखा से लेकर अन्य सामान तक पैसे देकर उपलब्ध कराया जाता है
और विरोध करने वालों को प्रताड़ित किया जाता है. उसने इस मामले की शिकायत मानवाधिकार आयोग और डीजी
जेल से करने की बात कही है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आरोप सही हैं तो क्या जेल के भीतर कानून की जगह मनमानी चल रही है? क्या किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया जा सकता है? क्या जेल प्रशासन की जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रह गई है?
इस मामले में जेलर मनीष पवार का पक्ष जानने के लिए कई बार फोन, संदेश और व्हाट्सएप के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. अब प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी और दोषी पाए जाने पर क्या कार्रवाई की जाएगी.
इनका कहना है.
जेलर को मीडिया के फोन उठा कर बात करना चाहिए. किसी भी कैदी के साथ पैसों को लेकर मारपीट करना बिल्कुल गलत है. मेरे पास शिकायत आती है तो इसकी जांच कराएगे. संतोष सोलंकी, जेल अधीक्षक, केंद्रीय जेल नर्मदापुरम
