काठमांडू | नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद पर एक चौंकाने वाला बयान देकर नई कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। संसद में उन्होंने दावा किया कि यह मुद्दा एकतरफा नहीं है और नेपाल ने भी भारत की कुछ भूमि पर कब्जा किया हुआ है। उन्होंने इस पुराने सीमा विवाद में चीन और ब्रिटेन को भी शामिल करने की वकालत की है। इस बयान के बाद नेपाल में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है और विपक्ष ने इसे राष्ट्रहित के विरुद्ध बताते हुए रिकॉर्ड से हटाने की मांग की है।
प्रधानमंत्री के इस बयान पर बढ़ते विवाद के बीच, नेपाल के विदेश मंत्रालय ने तुरंत स्थिति को संभालने की कोशिश की है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का आशय किसी औपचारिक क्षेत्रीय दावे से नहीं था, बल्कि वे केवल सीमा क्षेत्रों में अनजाने में हुए कब्जों और गायब सीमा स्तंभों (बॉर्डर पिलर्स) की ओर इशारा कर रहे थे। गौरतलब है कि नेपाल का लिपुलेख क्षेत्र पर दावा 1816 की सुगौली संधि की अपनी व्याख्या पर आधारित है, जो भारत और नेपाल के बीच एक संवेदनशील रणनीतिक मुद्दा रहा है।
लिपुलेख दर्रे और कालापानी जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रि-जंक्शन के निकट चीन का रुख हमेशा संतुलित रहा है। चीन इसे भारत और नेपाल का द्विपक्षीय मुद्दा मानकर सीधी मध्यस्थता से बचता आया है। हालांकि, भारत के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती रणनीतिक गतिविधियों को रोकना है। फिलहाल भारत और नेपाल के बीच 97 प्रतिशत सीमा विवाद सुलझा लिया गया है, और शेष मुद्दों को बातचीत के माध्यम से हल करने पर जोर दिया जा रहा है।

