
नीरज शर्मा श्योपुर। यह सिर्फ एक जंगल की कहानी नहीं है। यह उस चमत्कार की कहानी है, जिसने सूखी धरती में फिर से जीवन फूंक दिया। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसने कूनो को दुनिया के सबसे चर्चित वन्यजीव परिदृश्यों में खड़ा कर दिया। और यह उस सच की कहानी है, जो आज कूनो के हर पेड़, हर तालाब और हर वन्यजीव की आंखों में दिखाई देता है। चीते सिर्फ लौटे नहीं, वे अपने साथ जंगल की खोई हुई आत्मा भी वापस ले आए।
जब जंगल पानी के लिए तरसता था
कुछ साल पहले तक कूनो की गर्मियां जंगल और वन्यजीवों के लिए परीक्षा जैसी होती थीं। नदी के अलावा पानी का कोई भरोसेमंद स्रोत नहीं था। कई किलोमीटर तक फैली वनभूमि सूखे की चपेट में रहती थी। वन्यजीव पानी की तलाश में भटकते थे और जंगल का बड़ा हिस्सा निर्जीव-सा दिखाई देता था। लेकिन फिर एक ऐसा प्रयोग शुरू हुआ जिसने पूरे परिदृश्य को बदल दिया।
सौर ऊर्जा से चलने वाली जल-उठान परियोजनाओं के जरिए कूनो नदी का पानी पहाड़ियों और दूरस्थ जंगलों तक पहुंचाया गया। नतीजा ऐसा मिला जिसकी कल्पना शायद वन प्रबंधन ने भी नहीं की थी। जहां कभी धूल उड़ती थी, वहां अब पानी से भरे तालाब चमक रहे हैं और उनके आसपास वन्यजीवों की दुनिया बस चुकी है।
शाम होते ही शुरू होता है जंगल का महाकुंभ
आज कूनो के तालाबों के आसपास शाम का दृश्य किसी नेशनल जियोग्राफिक डॉक्यूमेंट्री से कम नहीं लगता। चीतल के झुंड कतारों में निकलते हैं। सांभर पानी के किनारे खड़े दिखाई देते हैं। नीलगायों ने इन इलाकों को स्थायी ठिकाना बना लिया है। तेंदुए तालाबों के आसपास अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं और दूर पहाड़ियों से आती सियारों की आवाजें जंगल की जीवंतता का ऐलान करती हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि पक्षियों का कलरव अब पूरे जंगल में सुनाई देता है। मानो प्रकृति ने फैसला कर लिया हो कि अब वह इस जंगल को छोड़कर कहीं नहीं जाएगी।
कूनो में लौटे वो मेहमान, जिनकी किसी को उम्मीद नहीं थी
कूनो की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल चीते नहीं हैं। असली कहानी उन प्रजातियों की वापसी है, जो वर्षों से यहां गायब थीं। भारतीय भेड़िया फिर दिखाई देने लगा है। जंगली कुत्ता (ढोल) ने पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। और सबसे हैरत की बात फॉरेस्ट आउलेट, जिसे कभी विलुप्त मान लिया गया था, अब नियमित रूप से कूनो में देखा जा रहा है। यह संकेत है कि जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से स्वस्थ हो रहा है।
चीता नहीं, बदलाव का ब्रांड एम्बेसडर
कूनो के डीएफओ आर. थिरुकुरल का मानना है कि चीता परियोजना अब केवल वन्यजीव संरक्षण का कार्यक्रम नहीं रही। उनके अनुसार, चीते ने पूरे परिदृश्य को नई पहचान दी है। संरक्षण को गति मिली, प्रबंधन मजबूत हुआ, पर्यटन बढ़ा, स्थानीय अर्थव्यवस्था को नया आधार मिला और जंगल को नई जिंदगी मिली।
जंगल से गांव तक पहुंचा जादू
कूनो के आसपास के गांवों में भी बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। पर्यटन बढ़ने से युवाओं को रोजगार मिल रहा है। स्थानीय लोग नेचर गाइड, पर्यटन सहयोगी और संरक्षण गतिविधियों से जुड़ रहे हैं। छोटे कारोबारों में तेजी आई है और लंबे समय बाद लोगों को लगने लगा है कि कूनो सिर्फ जंगल नहीं, अवसरों का भी केंद्र है।
घंटियों की जगह लौटी जंगल की आवाज
कभी इन जंगलों में सबसे ज्यादा सुनाई देने वाली आवाज मवेशियों की घंटियों की थी। आज वह आवाज धीरे-धीरे गायब हो गई है। उसकी जगह अब पक्षियों की चहचहाहट, वन्यजीवों की गतिविधियां और प्रकृति की स्वाभाविक ध्वनियां सुनाई देती हैं। यह बदलाव केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक है।
क्रॉनिकल की पड़ताल
कूनो अब सिर्फ चीतों का घर नहीं, भारत में वन संरक्षण की सबसे बड़ी सफलता की कहानी बन रहा है
कूनो की असली उपलब्धि चीते नहीं हैं। असली उपलब्धि है एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्जन्म। सूखे जंगलों में पानी पहुंचाना, वन्यजीवों की वापसी, दुर्लभ प्रजातियों का पुनः दिखाई देना और स्थानीय अर्थव्यवस्था का मजबूत होना, ये सब मिलकर बता रहे हैं कि कूनो में कोई साधारण बदलाव नहीं हुआ है।
कूनो आज यह संदेश दे रहा है कि जब संरक्षण, विज्ञान और इच्छाशक्ति एक साथ काम करते हैं, तो प्रकृति चमत्कार करने में देर नहीं लगाती। और शायद इसी वजह से आज कूनो में सिर्फ जंगल नहीं, बल्कि उम्मीद भी हरी-भरी नजर आती है।
