
महाकौशल की डायरी अविनाश दीक्षित। जबलपुर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में 58 लाख रुपए के घोटाले को लेकर अपर मिशन संचालक (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मप्र) के कार्यालय से जारी हुआ पत्र यानि नोटिस जबलपुर स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है। कभी सोशल मीडिया में वायरल खबर तो कभी बार बार सफाई देने के प्रयास इन दिनों स्वास्थ्य महकमें, प्रशासनिक गलियारों से लेकर मीडिया में सुर्खियां बटोर रहे हैं । हाल ही में सीएमएचओ बने डॉ. नवीन कोठारी विभाग की लुटती अस्मत बचाने जिला अस्पताल विक्टोरिया के पीआरओ के जरिए बार बार ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि जब घोटाला हुआ जब वे नहीं थे और इस घोटाले से उनका कोई लेना देना नहीं है। उनकी बात कहां तक सही है यह वक़्त के गर्भ में छिपा है किन्तु शहर से लेकर भोपाल तक के स्वास्थ्य विभाग के गलियारों ये चर्चाएं तेज हैं कि भ्रष्टाचार की जांच अगर सही ढंग से हो गई तो कई अधिकारी इसमें नप जाएंगे उसके अलावा संजीवनी क्लीनिकों के नाम पर गबन की गई करीब 56.98 लाख की राशि भी रिकवर की जाएगी।
विदित हो कि वर्ष 2025-26 में जबलपुर जिले की 58 संजीवनी क्लीनिकों को नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड यानी एनक्यूएएस के अनुरूप विकसित करने के लिए प्रति संस्था एक लाख रुपए के हिसाब से 58 लाख रुपए आवंटित किए गए थे। इनमें से 56.98 लाख रुपए खर्च भी कर दिए गए, लेकिन राज्य स्तर पर हुई समीक्षा में सामने आया कि जिले की एक भी शहरी स्वास्थ्य संस्था का एनक्यूएएस प्रमाणीकरण नहीं कराया गया। इतना ही नहीं संस्थाओं को मानकों के अनुरूप तैयार भी नहीं किया गया है। जिस दौरान यह सब हो रहा था उस वक्त सीएमएचओ डॉं संजय मिश्रा थे और यही बात अब डॉ नवीन कोठारी बताने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। सवाल ये खड़े हो रहे हैं कि अगर घोटाला हुआ है तो फिर गाज गिरना तय है अब ये गाज उस वक्त के सीएमएचओ पर गिरती है या फिर किसी अन्य पर ये तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि घोटाला नहीं हुआ है। इसके साथ ही सवाल ये भी है कि 4 मई को पत्र जारी हुआ तो क्या भोपाल के आला अधिकारियों को नहीं पता था कि जबलपुर के सीएमएचओ बदल गए हैं। कुछ जानकार इस पत्र के शब्दों में प्रशासनिक त्रुटि होना भी मान रहे हैं। गौरतलब है कि सीएमएचओ समेत 4 अधिकारियों को 4 मई को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। अधिकारियों को 15 दिन में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। इसके साथ ही चेतावनी दी गई है कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर खर्च की गई राशि संबंधित अधिकारियों से वसूल की जाएगी, लेकिन एक पखवाड़ा से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी जवाब अभी तक नहीं दिया गया है।
हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था….
हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, हमारी कश्ती तो वहां डूबी जहां पानी कम था… ये लाइन इन दिनों भारतीय जनता पार्टी के पार्षद व भाजपा के वरिष्ठ नेता महेेश सिंह राजपूत के ऊपर बिल्कुल फिट बैठती हुई उस वक्त नजर आई जब खबर वायरल हुई कि भाजपा पार्षद के साथ ही बैठे उनके एक साथी ने पार्षद का बीयर पीते हुए उनका वीडियो गुपचुप बनाकर सोशल मीडिया में वायरल कर दिया। बस फिर क्या था.. सफाई का दौर शुरू हो गया। वहीं अनुशासन के लिए प्रतिबद्ध माने जाने वाली भाजपा के अनुशासन पर भी ऊंगली उठीं। लिहाजा जब भाजपा पार्षद महेश सिंह राजपूत को ये पता चला कि उनके द्वारा बीयर पीते हुए बात करने का एक वीडियेा सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हुआ है तो उसके बाद उन्होंने मीडिया के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जो वीडियो वायरल किया गया है वो वर्ष 2004 का है जब वे कांग्रेस के पार्षद थे। साथ ही उन्होंने कहा कि वीडियो मेरी छवि को धूमिल करने वायरल किया गया है और मैंने कोई सार्वजनिक जगह पर बीयर नहीं पी थी, सार्वजनिक जगह पर मैं बीयर पीता तो अनुचित होता, हर व्यक्ति की अपनी निजी जिंदगी होती है। पार्षद ने दो टूक कहा कि निजी जिंदगी में किसका क्या हो रहा है इसमें किसी को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। महेश ने इस बात पर हैरानी जताई कि ये वीडियो पता नहीं क्या लाभ लेने के लिए वायरल किया गया है। अब वजह तो जो भी हो लेकिन पार्षद महोदय की इज्जत पर तो सवाल खड़े हो ही गए हैं। उधर राजनैतिक गलियारों में चर्चाएं तेज ये भी हैं कि यार कौन संगठन का आदमी ड्रिंक नहीं करता है कोई छिपकर करता है तो कोई खुलकर..।
तबादला रूकवाने काटने लगे चक्कर…
मध्यप्रदेश की एक मात्र यूनिवर्सिटी नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस में व्यवस्थाओं को सुधारने कुलसचिव या अन्य अधिकारियों को नहीं बल्कि इस बार संबंधित शाखाओं में पिछले कई सालों से जमे कर्मिचारियों को हटाया गया। खबर तो ये भी है कि आने वाले कुछ दिनों में करीब आधा दर्जन ऐसे कर्मचारियों के नाम भी शामिल हैं जो बहुत लापरवाह किस्म के माने जाते हैं। इसी तरह के कर्मी अपनी कमियों को जानते हुए अब आने वाली नई ट्रांसफर लिस्ट को लेकर अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटते नजर आ रहे हैं कि कहीं से कुछ सेटिंग फिट बैठ जाए। वजह साफ है कि उनका तबादला कहीं न हो लेकिन विवि प्रशासन के मंसूबे तो हकीकत कुछ और ही बयां करते नजर आ रहे हैं। विवि प्रशासन ट्रांसफर करने के बाद कर्मचारियों को कहां भेजेगा ये अभी स्पष्ट नहीं है जिसको लेकर कर्मचारियों का समूह खासा परेशान है। जानकारी के अनुसार जिन कर्मचारियों के खिलाफ लगातार शिकायतें मिल रहीं थीं उन्हीें को अभी हटाया गया है और आगे भी ऐसे ही कर्मचारियों को हटाया जाएगा। सूत्रों की माने तो प्रशासनिक फेरबदल कर जितने कर्मचारियों को अभी हटाया गया है उनकी कार्यशैली पर पिछले लंबे समय से गोपनीय तौर पर नजर रखी जा रही थी। हालांकि जिम्मेदार अधिकारी इस फेरबदल को रूटीन प्रक्रिया बता रहे हैं लेकिन अंदर की माने तो ये रूटीन प्रक्रिया नहीं बल्कि लापरवाह कर्मचारियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने वाली बात है।
