मोहब्बत और एहसास की आवाज़ खामोश, उर्दू जगत ने खोया अपना अज़ीम शायर; नहीं रहे बशीर बद्र

भोपाल। उर्दू अदब की दुनिया से गुरुवार को एक ऐसी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई, जिसने दशकों तक लोगों के जज़्बात को अपने अशआर में ढाला। पद्मश्री सम्मानित मशहूर शायर बशीर बद्र का भोपाल में 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और भूलने की बीमारी से भी जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य और शायरी प्रेमियों में शोक की लहर फैल गई। डॉ. बशीर बद्र ने अपनी ग़ज़लों के जरिए मोहब्बत, बिछड़न, तन्हाई, उम्मीद और जिंदगी के दर्द को बेहद सरल लेकिन असरदार अंदाज़ में पेश किया। यही वजह रही कि उनकी शायरी सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोगों की जुबान और दिलों का हिस्सा बन गई। उनके कई अशआर आज भी मुशायरों से लेकर सोशल मीडिया तक खूब उद्धृत किए जाते हैं।

उर्दू, हिंदी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी भाषा पर समान पकड़ रखने वाले बशीर बद्र ने साहित्य की कई महत्वपूर्ण रचनाएं दीं। उनके प्रमुख कविता संग्रहों में ‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘आस’ और ‘कुल्लियाते बशीर बद्र’ शामिल हैं। ग़ज़ल की आलोचना और शोध के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने ‘आजादी के बाद उर्दू ग़ज़लों का तनकीदी मुताला’ और ‘बीसवीं सदी में ग़ज़ल’ जैसी चर्चित कृतियां लिखीं।उनके निधन को उर्दू शायरी के एक सुनहरे दौर के अंत के रूप में देखा जा रहा है।

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