रावघाट तक 21 साल बाद पहुंची रेल, कभी विरोध करने वाले पूर्व नक्सली भी बने विकास यात्रा के साक्षी

भानुप्रतापपुर, 20 मई (वार्ता) छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में बुधवार को दो अलग-अलग तस्वीरों ने बस्तर में बदलते हालात और विकास की नई दिशा को एक साथ उजागर किया। एक ओर बहुप्रतीक्षित रावघाट रेल परियोजना के अंतिम चरण का सफल ट्रायल पूरा हुआ, वहीं दूसरी ओर आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों ने पहली बार रेल यात्रा कर विकास की इस नई कहानी को करीब से महसूस किया।

करीब दो दशक से अधिक समय से निर्माणाधीन रावघाट रेल परियोजना के तहत आज पहली बार ताडोकी से रावघाट तक रेल इंजन का सफल ट्रायल किया गया। रावघाट इस परियोजना का अंतिम स्टेशन माना जा रहा है। वर्ष 2007 के आसपास शुरू हुई इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अंतिम पड़ाव तक पहुंचाने में लगभग 21 वर्ष का लंबा समय लगा। परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती नक्सल प्रभावित क्षेत्र और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां रहीं।

इस लंबे सफर के दौरान कई सुरक्षाबल के जवानों, परियोजना से जुड़े कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने अपनी जान गंवाई, लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद रेल इंजन आखिरकार रावघाट तक पहुंचने में सफल रहा। इसे बस्तर क्षेत्र में विकास और आधारभूत संरचना के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

आज ही के दिन भानुप्रतापपुर से एक और भावनात्मक तस्वीर सामने आई, जहां आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों को जिला पुलिस द्वारा रेल यात्रा कराई गई। इनमें से कई लोग पहली बार ट्रेन देखने और उसमें सफर करने पहुंचे थे। रेल में यात्रा के दौरान उनके चेहरों पर उत्साह, जिज्ञासा और खुशी साफ दिखाई दी।

एक समय ऐसा भी था जब नक्सली गतिविधियों के कारण बस्तर क्षेत्र में रेल सेवाएं प्रभावित होती थीं और रेल परियोजनाएं उग्रवादियों के निशाने पर रहती थीं। जगदलपुर-बैलाडीला रेल मार्ग पर कई बार ट्रेनों का संचालन बाधित हुआ था लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं।

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