नई दिल्ली | भारत में कृषि भूमि बेचने पर टैक्स लगेगा या नहीं, यह पूरी तरह से जमीन की स्थिति (Location) पर निर्भर करता है। आयकर कानून के मुताबिक, अगर आपकी जमीन ‘ग्रामीण’ क्षेत्र में आती है, तो उसे कैपिटल एसेट नहीं माना जाता और इसे बेचने पर आपको कोई टैक्स नहीं देना होता। इसके विपरीत, यदि जमीन ‘शहरी’ क्षेत्र की सीमा में है और वहां की आबादी 10,000 से अधिक है, तो उसे बेचने से होने वाले मुनाफे पर टैक्स देना अनिवार्य है। शहर की सीमा से 2 से 8 किलोमीटर के दायरे में आने वाली जमीन भी अक्सर शहरी श्रेणी में ही गिनी जाती है।
शहरी खेती की जमीन बेचने पर होने वाले फायदे को दो श्रेणियों में बांटा गया है। अगर आप जमीन खरीदने के 2 साल के भीतर उसे बेचते हैं, तो होने वाले मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) माना जाता है, जिस पर आपके टैक्स स्लैब के अनुसार कर लगता है। वहीं, 2 साल के बाद जमीन बेचने पर होने वाला मुनाफा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) कहलाता है। लॉन्ग टर्म गेन पर इंडेक्सेशन के लाभ के साथ 20% टैक्स लगता है। इंडेक्सेशन के जरिए आप महंगाई के अनुपात में जमीन की खरीद लागत को बढ़ाकर अपना टैक्स काफी हद तक कम कर सकते हैं।
आयकर विभाग जमीन बेचने पर लगने वाले भारी टैक्स से बचने के लिए कई कानूनी रास्ते भी प्रदान करता है। धारा 54B के तहत, यदि आप पुरानी कृषि भूमि बेचकर अगले 2 साल के भीतर नई खेती की जमीन खरीद लेते हैं, तो आपको टैक्स में पूरी छूट मिल सकती है। इसके अलावा, यदि आप जमीन बेचने से मिले पैसों का उपयोग घर खरीदने में करते हैं, तो धारा 54F के तहत लाभ लिया जा सकता है। इसके साथ ही, आप धारा 54EC के तहत NHAI या REC जैसे सरकारी बॉन्ड्स में 50 लाख रुपये तक निवेश करके भी टैक्स की बड़ी बचत कर सकते हैं, बशर्ते यह निवेश 5 साल के लिए हो।

