नयी दिल्ली,11 मई (वार्ता) हाल ही में कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार देखने को मिले हैं और भविष्य में अनुबंध कृषि में बेहतर निवेश के साथ उच्च पैदावार तथा उत्पादकता के लिये कृषि क्षेत्र में प्रौद्योगिकी के प्रसार की भी संभावनाएं हैं। इन प्रयासों के माध्यम से कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को अपनाए जाने की पहल को बढ़ावा मिलेगा। सरकार द्वारा किसानों को बेहतर परामर्श उपलब्ध करवाने के लिये औद्योगिक क्षेत्र के साथ मिलकर एक ‘एआई संचालित फसल उपज पूर्वानुमान माॅडल’ के विकास पर कार्य किया जा रहा है। फसल उत्पादकता और उपज की पैदावार बढ़ाने, कृषि निवेश के अपव्यय को रोकने तथा कीट या रोग के प्रकोप की भविष्यवाणी करने के लिये एआई आधारित उपकरणों का प्रयोग किया जा रहा है।
मैपमाईक्रॉप संस्थान के सह संस्थापक और मुख्य कार्यअधिकारी राजेश सिरोले के मुताबिक भारत में खेती अब धीरे-धीरे तकनीक के साथ बदल रही है, जहाँ टेक्नोलॉजी किसानों के रोज़मर्रा के फैसलों का हिस्सा बनती जा रही है। मौसम के बदलाव से लेकर फसल की स्थिति तक, अब कई तरह की जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध है, जिससे किसानों को बेहतर योजना बनाने और खेतों में अचानक आने वाली समस्याओं से बचने में मदद मिल रही है।
इस समय सैटेलाइट इमेजरी और एडवाइजरी सिस्टम जैसे उपकरण 3.8 करोड़ से अधिक किसानों तक पहुँच रहे हैं, जो उन्हें यह समझने में सहायता कर रहे हैं कि कब क्या कदम उठाना है, किन बातों पर ध्यान देना है, और फसलों का प्रबंधन अधिक प्रभावी तरीके से कैसे करना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तकनीकी क्षमताएँ ज़मीनी स्तर पर वास्तविक और उपयोगी परिणामों में बदलें, जहाँ हर दिन खेतों में फैसले लिए जाते हैं। मैपमाईक्रॉप में हमारा ध्यान ऐसे इंटेलिजेंट डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पर है, जो जटिल जानकारियों को आसान, रियल टाइम और उपयोगी इनसाइट्स में बदल सके, ताकि हर किसान अधिक भरोसेमंद, समझदारी भरे और स्थिर फैसले ले सके ।
दक्षिण कैरोलिना विश्वविद्यालय में भारतीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान संगठन (आईएआईआरओ), कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के प्रोफेसर, डॉ. अमित शेठ ने बताया कि भारत में , किसान सीमित बुद्धिमान प्रणालियों के बीच जलवायु अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं, मरीज बिखरे हुए स्वास्थ्य ढांचे के भीतर काम कर रहे हैं, और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी उन भाषाओं में कौशल विकसित कर रहे हैं जिन्हें अधिकांश एआई प्रणालियाँ अभी भी ठीक से समझ नहीं पातीं। नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, एआई इन खाइयों को पाटने के सबसे प्रभावशाली साधनों में से एक बन सकता है। यह केवल तकनीक से जुड़ा एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि यदि हम इसे सही दिशा में ले जाएँ, तो इससे होने वाले फायदे असीमित हो सकते हैं। भारत का एआई बाजार 2027 तक 17 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने का अनुमान है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वास्तविक भारत के लिए यह कितना उपयोगी, भरोसेमंद और सुलभ बन पाता है।
उन्होंने कहा कि आईएआईआरओ में हमारा मानना है कि भारत का सबसे बड़ा अवसर देश की विविध क्षेत्रीय और सामाजिक आवश्यकताओं को समझने और उनके अनुरूप एक बिल्कुल अलग श्रेणी का एआई विकसित करने में है। ऐसा एआई जो विशिष्ट क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया हो, मल्टीमॉडल हो, और भारत की वास्तविक परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा हो। ये मॉडल सामान्य बातचीत के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवा, कृषि, जलवायु लचीलापन, शासन, शिक्षा और एंटरप्राइज़ प्रणालियों जैसी उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों की जटिल समस्याओं को हल करने के लिए बनाए गए हैं। ऐसे मॉडल जो संरचित ज्ञान के आधार पर तर्क कर सकें, सीमित कंप्यूट संसाधनों में काम कर सकें, बहुभाषी वातावरण में प्रभावी हों, और जहाँ सबसे अधिक आवश्यकता हो वहाँ भरोसेमंद परिणाम दे सकें। उन्होंने कहा कि भारत की एआई महत्वाकांक्षा को केवल बाजार के आकार या मूल्यांकन से नहीं आँका जा सकता। इसे इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि क्या हम ऐसी प्रणाली बना पा रहे हैं जो लोगों की क्षमता बढ़ाएँ, असमानताओं को कम करें, और भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करें और भारत की वास्तविक जटिलताओं में गहराई से निहित हो।

