कांग्रेस की नई कार्यकारिणी को लेकर उभरे असंतोष के स्वर

महाकौशल की डायरी

अविनाश दीक्षित: जबलपुर के जिला कांग्रेस कमेटी के नए गठन ने संगठन के भीतर भारी असंतोष को जन्म दे दिया है। घोषित नई कार्यकारिणी में ऐसे कई जमीनी कार्यकर्ताओं को तवज्जो नहीं मिली जिन्होंने विपरीत हालात में भी कांग्रेस का दामन मजबूती से थामे रखा। मौजूदा परिस्थिति को लेकर स्थानीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि जिस तरह कांग्रेस में आपसी प्रतिद्वंदिता बढ़ती जा रही है उसके कारण आने वाले चुनाव में कांग्रेस की जीती हुई सीट को बचाना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है। खबर तो ये भी है कि कांग्रेस की नई कार्यकारिणी में ऐसे नामों को दरकिनार किया गया है जो कि सालों से स्थानीय तौर पर कांग्रेस की रीढ़ माने जाते रहे हैं।

कार्यकारिणी से दरकिनार किए गए कांग्रेसियों का स्पष्ट कहना है कि जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी का दुष्परिणाम संगठन को भविष्य में होने वाले चुनाव में जरूर दिखेगा। कुछ स्थानीय कर्मठ कांग्रेसी तो ये कहते भी देखे जा रहे हैं कि कांग्रेस के कई ब्लॉक अध्यक्ष तो भाजपा की गोद में बैठे हैं और वे कभी नहीं चाहेंगे कि ईमानदार दमदार कार्यकर्ता पार्टी में आएं और संगठन को मजबूत बनाएं। वहीं कांग्रेस की नई कार्यकारिणी घोषित होने के बाद स्थानीय तौर पर विरोध के स्वर दिनों दिन मुखर होते जा रहे हैं। विगत दिवस ही एक असंतुष्ट पदाधिकारी ने इस्तीफ़ा देकर इस बात को पुष्ट कर दिया कि जबलपुर कांग्रेस कमेटी में सतही तौर पर दिख कुछ रहा है किन्तु अंदरूनी हकीकत कुछ और ही है।
बालाघाट में पाला बदलने की सुगबुगाहट
बालाघाट की राजनीति में एक बड़े बदलाव के कयास लगाए जाने लगे हैं। सूत्रों की माने तो जिला कांग्रेस कमेटी बालाघाट के कुछ विधायक और वरिष्ठ नेता भाजपा के संपर्क में चल रहे हैं और आने वाले समय में पार्टी बदल सकते हैं। राजनैतिक जानकारों का मानना है कि प्रदेश में पहले भी कांग्रेस को कई झटके लग चुके हैं ऐसे में अगर कोई पार्टी बदलता है तो ये एक और बड़ा वज्रपात होगा। कांग्रेस में कुछ विधायक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से खफा चल रहे हैं और संगठन में उपेक्षा का आरोप भी लगा रहे हैं । एक यही मुख्य वजह है कि पार्टी बदलने की बात सामने आने लगी है। लिहाजा कांग्रेस के स्थानीय फूल छाप नेताओं का कहना है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है। वहीं जमीनी हकीकत और स्थानीय राजनैतिक गलियारों की चर्चाओं की माने तो बदलाव की लहर बहुत जल्द चलने वाली है जिसका असर कांग्रेस में लम्बे समय तक रह सकता है।
ए ग्रेड की यूनिवर्सिटी मगर शिक्षक मेहनताना को मोहताज
क्या इस सत्र भविष्य में होने वाली स्नातक व स्नातकोत्तर की लगभग सभी परीक्षाओं के परिणाम जारी नहीं होंगे… क्या आने वाले सत्र की पढ़ाई देर से शुरू होगी और विवि व इससे संबंद्धित कॉलेजों के विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होगी ? ये सारे सवाल राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (नैक) द्वारा प्रदत्त ए ग्रेड के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने इन दिनों चुनौती बनकर खड़े हुए हैं। इसकी मुख्य वजह ये है कि रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से जुड़ी परीक्षाओं की उत्तरपुस्तिकाएं जांचने वाले करीब सैंकड़ों अतिथि शिक्षक और प्राध्यापकों के करीब 50 लाख रुपए अटके हुए हैं, ऐसे में शिक्षकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है, और वह पूरा गुस्सा विवि प्रशासन की कार्यशैली पर उतार रहे हैं।

खबर है कि वश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2023 से 2025 तक कॉपियां जांचने वाले सैंकड़ों शिक्षकों को अब तक भुगतान नहीं किया गया है। विदित हो कि अभी विश्वविद्यालय और संबद्ध महाविद्यालयों के बहुत कम नियमित प्राध्यापक कॉपी जांचने का कार्य करते हैं। लेकिन ऐसे में अब यह जिम्मेदारी पूरी तरह अतिथि शिक्षकों के भरोसे हो जाएगी। अराजक माहौल के बीच जो खबर निकलकर आ रही है उससे तो स्पष्ट नजर आ रहा है कि कई नियमित प्राध्यापक मूल्यांकन कार्य से दूरी बनाने लगे हैं। वहीं आरडीवीवी के परीक्षा नियंत्रक एसके दुबे ने आश्वासन दिया है कि बिलों का सत्यापन कर उन्हें लेखा विभाग भेज दिया गया है, जल्द भुगतान कराने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन जिम्मेदार के इस आश्वासन को शिक्षक, प्राध्यापक गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। मूल्यांकन कार्य करने के बाद मेहनताना न मिलने से नाराज शिक्षकों, प्राध्यापकों द्वारा विवि प्रशासन के गलियारों में खुलेआम विरोध भी जताया जा रहा है। ऐसे में नैक द्वारा प्रदत्त ए ग्रेड के विवि की छवि कहीं न कहीं धूमिल होती नजर आ रही है। खबर तो ये भी है कि अब पीड़ित शिक्षक भोपाल कूच कर शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों के दरबार भी जाने वाले हैं।

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