गुवाहाटी | असम विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। भाजपा नीत एनडीए ने रिकॉर्ड 102 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सत्ता का मार्ग प्रशस्त किया है। इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि भाजपा ने 90 में से 82 सीटों पर जीत दर्ज कर पहली बार राज्य में अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा पार किया है। वहीं सहयोगी दल बीपीएफ और एजीपी को 10-10 सीटें मिली हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत ने राज्य में ‘असमिया क्षेत्रीयता’ की राजनीति को हाशिए पर धकेल दिया है और जनता ने भाजपा को असमिया समुदाय के “आखिरी रक्षक” के रूप में स्वीकार कर लिया है।
इस प्रचंड जीत का एक बड़ा श्रेय राज्य सरकार की ‘लाभार्थीवादी’ (वैलफेयर) राजनीति को दिया जा रहा है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के जरिए सीधे खातों में धन पहुंचने, शिक्षा पर सब्सिडी और महिलाओं को स्वरोजगार के लिए मिलने वाली वित्तीय सहायता ने मतदाताओं को काफी प्रभावित किया। हालांकि, जानकारों ने चेतावनी दी है कि सरकार पर बढ़ता कर्ज और चुनावी वादों को पूरा करने की प्रतिबद्धता आने वाले पांच वर्षों में वित्तीय स्थिति के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। आम जनता के बीच अतिक्रमण विरोधी अभियान और आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा के भरोसे ने भी भाजपा की राह को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन और एआईयूडीएफ जैसे दलों को बड़ा झटका दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि परिसीमन के बाद भाजपा की रणनीति हिंदुओं के हितों पर केंद्रित रही, जिसे जनता का व्यापक समर्थन मिला। दूसरी ओर, बंगाली भाषी मुसलमानों के बीच प्रभाव रखने वाली एआईयूडीएफ महज दो सीटों पर सिमट गई, जो इस बात का संकेत है कि ‘मिया’ समुदाय ने भी पुराने नेतृत्व को नकार दिया है। फिलहाल, भाजपा की इस जीत ने राज्य में हिंदुत्व और विकास के एजेंडे को और मजबूती दी है, लेकिन भविष्य में जनता की बढ़ती उम्मीदों को पूरा करना नई सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

