
ग्वालियर चंबल डायरी हरीश दुबे। करीब छह वर्ष से खाली पड़े ग्वालियर के तीनों प्राधिकरण अब भरे जा चुके हैं। शिवराज के साढ़े तीन और मोहन यादव के ढाई बरस के कार्यकाल में इन प्राधिकरणों में सिर्फ इस वजह से नियुक्तियां नहीं हो रही थीं क्योंकि प्रदेश की सत्ता वीथिकाओं के क्षत्रप स्कूटनी के बाद तय चुनिंदा नामों न तो एकराय हो पा रहे थे और न ही नेतृत्व द्वारा सुझाए नामों पर रजामंदी दे रहे थे। अब जब मौजूदा प्रदेश सरकार अपने कार्यकाल की अर्धावधि पूरी करने की तरफ है, तब कहीं किसी तरह नाम तय हुए हैं। प्राधिकरण अध्यक्ष पद पर नियुक्तियों का विश्लेषण करें तो यही जाहिर होता है कि सिंधिया, नरेन्द्र सिंह और संघ ने तीन प्राधिकरणों में से एक एक अपने नाम कर लिया है। साडा की अध्यक्षी सिंधिया के पाले में गई है तो मेला प्राधिकरण पर नरेन्द्र सिंह खेमे ने परचम फहराया है वहीं जीडीए की अध्यक्षी संघ के नाम दर्ज हुई है। मेला प्राधिकरण की अध्यक्षी के लिए सिंधिया खेमे की ओर से पूर्व विधायक रमेश अग्रवाल का नाम आगे बढ़ाया गया था लेकिन उन्हें पीछे छोड़ते हुए नरेन्द्र सिंह अपने राइटहैंड कहे जाने वाले बाबा को चेयरमैनशिप दिलाने में कामयाब रहे। साडा में विराजे अशोक शर्मा और जीडीए के मधुसूदन, दोनों ही छात्र राजनीति की उपज हैं। अशोक जहां करीब साढ़े चार दशक पहले जेयू स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष रहे तो मधुसूदन छात्र राजनीति के दौर में एबीवीपी के धुरंधर रहे। कह सकते हैं कि तीनों ही अध्यक्षों ने कांटों का ताज पहना है। साडा और जीडीए अरसे से आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। हाउसिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में कार्यरत इन दोनों ही सेमी गवर्नमेंट अथॉरिटीज के परस्पर विलय कर एक निकाय बनाने का सुझाव कई बरस पहले आया था लेकिन महाराज इसके लिए तैयार नहीं हुए, लिहाजा दोनों का ही पृथक स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखते हुए पहले की ही तरह अलग अलग अध्यक्ष बनाए गए हैं। शहर की तेजी से बढ़ती आबादी का दवाब कम करने पश्चिमी छोर पर तिघरा बांध और कुलैथ, सौंजना गांव के समीप काउंटर मैग्नेट सिटी बसाने वाले साडा के पास जमीन की कमी नहीं है लेकिन कनेक्टिविटी के अभाव में नया शहर आबाद नहीं हो रहा है। जबकि जीडीए के पास नए प्रोजेक्ट्स का अभाव है। देखना है कि नए सदर शहर की पहचान बन चुकी इन संस्थाओं के सूरतेहाल में क्या चेंज पॉजिटिविटी लाते हैं।
नए निजाम के समक्ष समर नाइट मेला लगाने की चुनौती
ग्वालियर मेला प्राधिकरण में नए निजाम ने बाजे गाजे और जोश खरोश के साथ जिम्मेदारी संभाल ली, इसी के साथ उन पर पंद्रह मई से प्रस्तावित समर नाइट मेला को तयशुदा वक्त से लगाने के लिए दवाब बढ़ गया है। नए सदर और डिप्टी भले ही यह कह रहे हैं कि अभी तो पारी शुरू हुई है और सब कुछ गुड गुड होगा लेकिन मेला व्यापारियों में इस बात पर नाराजगी है कि अभी तक समर नाइट मेला के लिए कील भी नहीं धरी गई है। बमुश्किल पंद्रह दिन बचे हैं, ऐसी सूरत में तय वक्त से मिड-ईयर फेयर कैसे लग सकेगा। उम्मीद पर आसमान टिका है, इसी भरोसे के साथ मेला व्यापारी संघ ने नए नेतृत्व से उम्मीद लगाई है कि वे अगले एक डेढ़ माह तक अपना ध्यान समर नाइट मेला के सुचारु और निर्विघ्न आयोजन पर ही केंद्रित रखेंगे। अगर हर साल सर्दी के मौसम में लगने वाले दो महीने के सालाना मेले की बात करें तो उसकी चमक दमक भी अब पहले जैसी नहीं रही। हालत यह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी आने वाले कई पारंपरिक दुकानदारों ने यहां आना ही बंद कर दिया है। सिर्फ ऑटोमोबाइल सेक्टर ही मेला की लाज बचाए हुए है। कभी बॉलीवुड सितारों से रोशन रहने वाला मेला मंच भी अब फीका हो गया है। कोशिश यही होनी चाहिए कि इस बरस का मेला बीते बरसों की बनिस्पत बेहतर और यादगार बने।
छत्रपों के बीच विकास का तमगा हासिल करने की होड़
सत्ता दल की ग्वालियर की राजनीति के दो क्षत्रपों के बीच विकास कार्यों का श्रेय लेने की होड़ से उपजी तनातनी कम होने का नाम नहीं ले रही। मंगल के रोज फिर यही हुआ। सिंधिया और सांसद भारतसिंह के काफिले ग्वालियर से मुरैना की तरफ जाने वाले रूट पर दौड़ते दिखाई दिए लेकिन वक्त अलग अलग था और मंजिल भी जुदा। सिंधिया अपने लाव लश्कर के साथ सुबह दस बजे वेस्टर्न बायपास पर चल रहे कार्य का मुआयना करने गए तो सांसद भारत सिंह सुबह सात बजे ही नगर निगम के अफसरों को साथ लेकर चंबल पेयजल प्रोजेक्ट का निरीक्षण कर आए। दोनों नेता शहर विकास से जुड़े मसलों पर अफसरों की समानांतर बैठकें भी लेते रहे हैं। प्रशासन को दोनों तरफ सामंजस्य बनाकर चलना पड़ रहा है।
(फोटो: सिंधिया, भारत सिंह)
