मुंबई | वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारतीय रुपया गुरुवार को ऐतिहासिक गिरावट का शिकार हो गया। विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 32 पैसे की भारी गिरावट के साथ 95.20 प्रति डॉलर के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुँच गया। बाजार खुलते ही रुपया 95.01 पर था, लेकिन डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के चलते इसमें जबरदस्त गोता देखा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर इंडेक्स में मजबूती और अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 122 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुँचने से भारतीय मुद्रा पर दबाव असहनीय हो गया है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स के विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की इस दुर्गति का मुख्य कारण खाड़ी देशों में जारी तनाव है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रोकने और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी से तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा है और आयात खर्च बढ़ गया है। इस भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने निवेशकों को डरा दिया है, जिससे वे घरेलू बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश की ओर भाग रहे हैं।
रुपये में गिरावट का सीधा असर घरेलू शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 821 अंक टूटकर 76,674 पर आ गया, जबकि निफ्टी भी करीब 287 अंकों की गिरावट के साथ 24,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने बुधवार को अकेले 2,468 करोड़ रुपये से अधिक के शेयर बेचे, जिससे बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ गया। 1947 में डॉलर के बराबर रहने वाला रुपया आज अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है, जो मध्यम वर्ग के लिए महंगाई और विदेश यात्रा को और अधिक महंगा बना देगा।

