दुबई | पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने तेल निर्यातक देशों के शक्तिशाली संगठन ‘ओपेक’ (OPEC) से अलग होने का चौंकाने वाला फैसला लिया है। यूएई की आधिकारिक समाचार एजेंसी ‘वाम’ (WAM) के अनुसार, देश 1 मई, 2026 से ओपेक और ओपेक+ गठबंधन से औपचारिक रूप से बाहर हो जाएगा। यूएई ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय उसकी दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि और घरेलू ऊर्जा उत्पादन में तेजी लाने की रणनीति का हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों से उत्पादन कोटे को लेकर यूएई और सऊदी अरब के बीच बढ़ते मतभेदों ने इस ऐतिहासिक अलगाव की नींव रखी है, जिससे अब वैश्विक तेल कूटनीति का समीकरण पूरी तरह बदलने वाला है।
यूएई का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की नाकाबंदी से दुनिया के कच्चे तेल की आपूर्ति का पांचवां हिस्सा बाधित है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें आसमान छू रही हैं। यूएई के इस कदम को संगठन की पकड़ कमजोर होने के रूप में देखा जा रहा है। ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक होने के नाते यूएई के बाहर निकलने से सऊदी अरब के नेतृत्व वाले इस कार्टेल के लिए बाजार की कीमतों को नियंत्रित करना अब और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूएई के इस फैसले का स्वागत किया है। ट्रंप लंबे समय से ओपेक पर तेल की कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ाकर “दुनिया को लूटने” का आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने खाड़ी देशों को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता को भी तेल की कीमतों से जोड़ा था। विशेषज्ञों का मानना है कि ओपेक से बाहर निकलने के बाद यूएई अब अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा, जिससे वह वैश्विक मांग को अधिक लचीले ढंग से पूरा कर सकेगा। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि इस कदम से खाड़ी देशों की एकता में दरार आ सकती है और आने वाले दिनों में ऊर्जा बाजार में और अधिक अस्थिरता देखी जा सकती है।

