बानाबीड़ा/भौंरा:इन दिनों अध्यात्म की अविरल मंदाकिनी प्रवाहित हो रही है। गेंदालाल यादव परिवार द्वारा आयोजित यह ‘श्रीमद्भागवत कथा’ मात्र एक आयोजन नहीं, अपितु पितृ-ऋण से मुक्ति और गोविंद-प्रीति का एक अलौकिक सोपान सिद्ध हो रही है।देवास की पावन माटी से पधारीं प्रखर वक्ता, सुश्री अर्चना दीदी की ओजस्वी वाणी ने श्रोताओं के अंतर्मन को श्रीकृष्ण प्रेम के रस से सराबोर कर दिया है। दीदी का ओजपूर्ण व्यक्तित्व और दिव्य आभा समाज के लिए किसी प्रेरणा-पुंज से कम नहीं है। कथा के चतुर्थ दिवस पर भगवान की ‘बाल लीलाओं’ का जो सजीव चित्रण हुआ, उसने वातावरण को गोकुलमय बना दिया ।
नटखट नंदलाल की माखन चोरी मात्र एक कौतुक नहीं, अपितु भक्त के हृदय रूपी नवनीत को चुराने की अलौकिक कला है।यशोदा नंदन का मृत्तिका भक्षण कर मुख में ब्रह्मांड दर्शन कराना यह सिद्ध करता है कि चराचर जगत उन्हीं की सत्ता में निहित है। पूतना उद्धार से लेकर शकटासुर वध तक की लीलाएं अधर्म के विनाश और शरणागत वत्सलता का जीवंत प्रमाण हैं। ओखल बंधन की लीला यह संदेश देती है कि जो संपूर्ण जगत को प्रेम के धागे में बांधता है, वह स्वयं प्रेम के पाश में बंधने को आतुर रहता है।कालिया मर्दन के माध्यम से प्रभु ने हृदय के विकारों को शांत कर शांति और अभय का वरदान प्रदान किया।
कथा कार्यक्रम में सम्मिलित हुए समाजसेवी सुरेश कुमार राठौड़ ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कथा के मर्म को रेखांकित करते हुए कहा कि भागवत का मूल ‘प्रेम’ है—जहाँ जीव और ईश्वर का तादात्म्य स्थापित होता है। उन्होंने बल दिया कि इस नश्वर संसार में केवल गोविंद का नाम ही शाश्वत सत्य है। अहंकार का विसर्जन कर प्रभु की अनन्य शरणागति ही भक्ति की पराकाष्ठा है।
व्यासपीठ से अर्चना दीदी ने उद्घोष किया कि निष्काम कर्म और प्राणी मात्र में ईश्वर का दर्शन ही भागवत का वास्तविक संदेश है। जो साधक इस कथामृत का पान करता है, वह जन्म-मरण के आवागमन से मुक्त होकर उस परमपद को प्राप्त करता है, जहाँ केवल और केवल परमानंद की व्याप्ति है। यह ज्ञान यज्ञ क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।
