लोकतंत्र के महापर्व में प्रशासनिक लापरवाही की बड़ी तस्वीर, 300 किलोमीटर दूर से वोट डालने पहुंचे बुजुर्ग को मतदाता सूची से नाम गायब होने पर लौटना पड़ा खाली हाथ

सूरत | सूरत जिले के ओलपाड तालुका के कीम गांव में लोकतंत्र के प्रति समर्पण और प्रशासनिक तंत्र की भारी चूक का एक हृदयविदारक मामला सामने आया है। अहमदाबाद में रह रहे 75 वर्षीय एक बुजुर्ग मतदाता केवल अपना वोट डालने के लिए चिलचिलाती धूप में 300 किलोमीटर का सफर तय कर कीम गांव पहुंचे थे। उनके पास वैध चुनाव कार्ड (वोटर आईडी) भी मौजूद था, लेकिन जब वे मतदान केंद्र के भीतर पहुंचे, तो वहां मौजूद अधिकारियों ने उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया कि मतदाता सूची से उनका नाम काट दिया गया है। 75 साल की उम्र में भी वोट देने का जज्बा रखने वाले बुजुर्ग को इस अव्यवस्था के कारण अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित होना पड़ा।

अपना नाम वोटर लिस्ट से नदारद पाकर बुजुर्ग मतदाता मीडिया के सामने बेहद भावुक हो गए और अपना दर्द बयां किया। उन्होंने सिसकते हुए कहा कि वे अपना पवित्र वोट डालने की इच्छा लेकर इतनी दूर से आए थे, लेकिन उन्हें ऐसा महसूस कराया गया जैसे वे जीवित होते हुए भी सिस्टम की नजरों में “मृत” हो चुके हैं। बुजुर्ग ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि शायद अगले चुनाव तक वे जीवित रहें या न रहें, लेकिन इस बार अपना अंतिम वोट डालने की उनकी अंतिम इच्छा अधूरी ही रह गई। हाथ में पहचान पत्र होने के बावजूद उन्हें पोलिंग बूथ से खाली हाथ लौटना पड़ा, जो चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों में जबरदस्त आक्रोश देखा जा रहा है। लोगों का सवाल है कि आखिर बीएलओ (BLO) के वेरिफिकेशन में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई और किस आधार पर एक जागरूक नागरिक का नाम सूची से हटाया गया। एक ओर जहां निर्वाचन आयोग ‘शत-प्रतिशत’ मतदान के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर अभियान चला रहा है, वहीं दूसरी ओर इस तरह की लापरवाही लोकतंत्र में नागरिकों के भरोसे को कमजोर करती है। यह मामला साबित करता है कि जमीनी स्तर पर डेटा अपडेट करने की प्रक्रिया में सुधार की सख्त जरूरत है ताकि किसी भी जीवित और जागरूक मतदाता को इस तरह अपमानित न होना पड़े।

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