खंडवा से छिन गया पत्रकारिता का केंद्र, 25 साल बाद ‘कर्मवीर विद्यापीठ’ पर ताला

खंडवा। राष्ट्रकवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मभूमि खंडवा से पत्रकारिता की जीवंत विरासत का एक अध्याय समाप्त हो गया है। निमाड़ अंचल में पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता की पौध तैयार कर रहे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के ‘कर्मवीर विद्यापीठ’ परिसर को प्रबंधन ने आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया है। विश्वविद्यालय द्वारा नए शैक्षणिक सत्र के लिए जारी किए गए प्रवेश विज्ञापन में खंडवा केंद्र का नाम शामिल न होना इस क्षेत्र के भविष्य के पत्रकारों और शिक्षाविदों के लिए एक बड़ा आघात है। विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति विजय मनोहर तिवारी ने इस कठोर निर्णय के पीछे ‘आर्थिक घाटे’ को मुख्य कारण बताया है। प्रबंधन का तर्क है कि वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर न होने के कारण इस केंद्र को आगे संचालित करना व्यावहारिक नहीं रह गया था।

परंतु, इस निर्णय ने एक गंभीर वैचारिक प्रश्न को जन्म दे दिया है। स्थानीय नागरिकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थान सार्वजनिक सेवा और ज्ञान के विस्तार के लिए होते हैं, न कि किसी व्यापारिक इकाई की तरह लाभ कमाने के लिए। खंडवा जैसे क्षेत्र में, जहाँ से इस विश्वविद्यालय की वैचारिक नींव जुड़ी है, वहाँ केवल बजट और घाटे का हवाला देकर संस्थान को बंद करना निमाड़ के साथ अन्याय है।

इस परिसर का इतिहास सरकारी उपेक्षा और प्रशासनिक विफलता की कहानी भी बयां करता है। ढाई दशक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी यह केंद्र आनंद नगर स्थित एक किराए के भवन में ही संचालित होता रहा। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इन 25 वर्षों में स्थायी परिसर के निर्माण के लिए चार अलग-अलग स्थानों पर जमीन चिन्हित की गई, लेकिन हर बार फाइलें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और तकनीकी बहानों की भेंट चढ़ गईं। कभी जमीन को शहर से दूर बताया गया, तो कभी उबड़-खाबड़ कहकर प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणाएं भी धरातल पर नहीं उतर सकीं और अंततः नगर निगम से मिली भूमि पर भी निर्माण शुरू नहीं हो पाया।

आज इस केंद्र की तालाबंदी से निमाड़ और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों के उन प्रतिभावान युवाओं के सामने संकट खड़ा हो गया है, जिनके लिए मीडिया जगत में प्रवेश का यह सबसे सुलभ और प्रतिष्ठित मार्ग था। इस केंद्र के पूर्व छात्र आज देश के शीर्ष मीडिया संस्थानों में कार्यरत हैं, जो इसकी गुणवत्ता का प्रमाण है। वर्तमान में शहर के विभिन्न संगठनों ने सरकार से इस फैसले पर रोक लगाने और राष्ट्रकवि की स्मृतियों से जुड़े इस संस्थान को पुनर्जीवित करने की पुरजोर मांग की है।

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