
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने नगर निगम जबलपुर की याचिका इस टिप्पणी के साथ निरस्त कर दी कि श्रम न्यायालय द्वारा पारित आदेश में कानून या क्षेत्राधिकार संबंधी कोई त्रुटि नहीं है। श्रम न्यायालय ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता की उन आपत्तियों को निरस्त कर दिया था, जिनमें निष्पादन कार्यवाही की स्वीकार्यता पर प्रश्न उठाते हुए यह तर्क दिया गया था कि यह समय-सीमा के कारण वर्जित है।
दरअसल अनोवदक जबलपुर निवासी छोटेलाल खुरासिया की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार पांडे ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि इस याचिका के जरिए नगर निगम जबलपुर ने श्रम न्यायाालय के 31 अक्टूबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके जरिए श्रम न्यायालय के अवार्ड के एग्जिक्यूशन की मेंटेनेबिलिटी के बारे में आपत्ति को निरस्त कर दिया गया था। नगर निगम ने एग्जिक्यूशन प्रोसिडिंग्स पर इस आधार पर आपत्ति जताई थी कि अवार्ड को एग्जिक्यूशन में लाने की समय-सीमा खत्म हो गई है और इसलिए एग्जिक्यूशन प्रोसिडिंग्स आगे नहीं बढ़ सकतीं। श्रम न्यायालय ने उस आपत्ति को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि अवार्ड एग्जिक्यूटेबल है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मूल अधिनियम के मूल प्रविधानों के अनुसार, जिसमें निष्पादन के लिए न तो धारा 108 में और न ही अधिनियम में कहीं और कोई समय-सीमा निर्धारित की गई है। यहां तक कि धारा 108 के अनुसार वसूली की प्रक्रिया भी सीआरपीसी की धारा 421 के अनुरूप होगी, जबकि नियम 48-ए इस उद्देश्य के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता को अपनाते हुए एक बिल्कुल ही अलग तरीका प्रदान करता है। अत: यह निर्णय दिया जाता है कि नियम 48-ए का उपयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए नहीं किया जा सकता कि 1960 के अधिनियम के तहत अवार्ड को लागू करने हेतु निष्पादन कार्यवाही शुरू करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित है।
