नई दिल्ली | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हड़कंप मचा दिया है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्ग पर खतरे की आहट मिलते ही कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। एशियाई शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है और निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कूटनीतिक गतिरोध जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है, जिससे आने वाले दिनों में माल ढुलाई और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आना तय है।
भारत के लिए यह भू-राजनीतिक तनाव एक बड़े आर्थिक संकट के रूप में उभर रहा है। अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर होने के कारण, तेल की कीमतों में वृद्धि से देश का आयात बिल बढ़ेगा और राजकोषीय घाटे पर दबाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, शिपिंग रूट्स में बाधा आने से भारत के बाहरी व्यापार पर भी बुरा असर पड़ा है, जिससे देश के करीब 20 प्रतिशत निर्यात के प्रभावित होने की आशंका है। लाल सागर और ओमान की खाड़ी के रास्ते व्यापार करना चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिससे भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ गई है और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो रही है।
इस संकट का सबसे गंभीर मानवीय और सामाजिक प्रभाव खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों पर पड़ा है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी देशों में निर्माण और गिग सेक्टर में काम के अवसर तेजी से घटने के कारण लगभग 9 लाख भारतीय नागरिक अपनी नौकरियां छोड़कर स्वदेश लौट चुके हैं। इतनी बड़ी संख्या में भारतीयों की वापसी से विदेशों से आने वाले धन (Remittances) में भारी गिरावट आने की संभावना है, जिसका सीधा असर केरल जैसे उन राज्यों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा जो इन प्रेषणों पर निर्भर हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत को बढ़ती बेरोजगारी और मुद्रास्फीति की दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है।

