इंदौर: प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवाय में संचालित सहारा वार्ड बेसहारा और लावारिस मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरा है. यहां अब तक करीब तीन हजार अज्ञात मरीजों का इलाज किया जा चुका है. वहीं, चार सौ से अधिक मरीजों को स्वस्थ होने के बाद उनके परिजनों से भी मिलवाया है.प्राप्त जानकारी के अनुसार, साल 2016 में महज 6 बेड से शुरू हुआ यह वार्ड आज 30 से ज्यादा बेड की क्षमता के साथ लगातार सेवा दे रहा है. यहां हर साल 300 से अधिक बेसहारा मरीजों का उपचार किया जाता है. वर्तमान में भी करीब 18 मरीज भर्ती हैं, जिनमें ज्यादातर 50 वर्ष से अधिक आयु के हैं. सहारा वार्ड उन मरीजों के लिए बनाया गया है, जिन्हें बीमारी, दुर्घटना या लाचारी की हालत में उनके अपने ही सड़क, बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर छोड़ जाते हैं. ऐसे मरीजों को अस्पताल में भर्ती कर उनका पूरा इलाज किया जाता है, साथ ही भोजन, चाय नाश्ता और दैनिक देखभाल की जिम्मेदारी भी स्टॉफ निभाता है. वार्ड का स्टॉफ ही इन मरीजों का परिवार बन जाता है.
अपनापन देने के लिए मरीजों के बीच मनाए जाते हैं सभी त्यौहार
मरीजों को अपनापन देने के लिए यहां त्योहार भी साथ मनाए जाते हैं, ताकि उन्हें अकेलापन महसूस न हो. मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घंघोरिया ने बताया कि यहां मरीजों को एम्बुलेंस, सामाजिक संस्थाओं और पुलिस के माध्यम से लाया जाता है. कई मामलों में परिजन खुद तलाश करते हुए भी पहुंच जाते हैं. मरीजों के स्वस्थ होने के बाद उनकी पहचान और घर का पता लगाने के लिए पुलिस, एम्बुलेंस स्टॉफ, सामाजिक संस्थाएं और मीडियाकर्मी मिलकर काम करते हैं.
जब तक कोई सहारा नहीं मिलता, तब तक की जाती है देखभाल
आपसी समन्वय और जानकारी के आधार पर मरीजों को उनके परिवार तक पहुंचाया जाता है. जिन मरीजों के परिजन नहीं मिलते, उन्हें वृद्धाश्रमों में भेजा जाता है. जब तक उन्हें कोई सहारा नहीं मिलता, तब तक सहारा वार्ड और उससे जुड़ी संस्थाएं ही उनका परिवार बनकर देखभाल करती हैं. डीन डॉ. घंघोरिया का कहना हैं कि इन मरीजों की सेवा परिवार की तरह की जाती है. इस कार्य में लगी पूरी टीम उन्हें बेहतर इलाज व सम्मानजनक जीवन देने के लिए प्रतिबद्ध है
