पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध जैसे हालातों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बार फिर अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया है. इसका सीधा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पडऩा स्वाभाविक है. विशेष रूप से देश के लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) इस संकट की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभर रहे हैं. ऐसे समय में इन उद्योगों को सहारा देना केवल आर्थिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता की भी अनिवार्यता है.
ऊर्जा और खाद्य संकट की आशंका ने उत्पादन लागत को तेजी से बढ़ा दिया है. भारत की आयातित महंगाई पांच प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है, जो इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में लागत आधारित दबाव और गहराएगा. मार्च में विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा 12.7 अरब डॉलर की निकासी यह दर्शाती है कि वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी डगमगा रहा है. ऐसे में सबसे पहले झटका उन्हीं एमएसएमई को लगता है, जिनकी वित्तीय स्थिति पहले से ही सीमित संसाधनों पर टिकी होती है.
सरकार द्वारा इस स्थिति को संभालने के प्रयास सराहनीय हैं. औद्योगिक संगठनों और छोटे उद्यमियों से लगातार संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं का आकलन किया जा रहा है. निर्यात लागत कम करने के लिए 500 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा और पेट्रोल-डीजल पर कर में कटौती जैसे कदम राहत देने वाले हैं. लेकिन वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि यह प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि इन्हें और व्यापक तथा लक्षित बनाने की आवश्यकता है.
कोरोना काल के दौरान लागू की गई इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम ने एमएसएमई क्षेत्र को बड़ी राहत दी थी. आज एक बार फिर वैसी ही पहल की जरूरत महसूस हो रही है. सरकार को चाहिए कि वह प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें आसान शर्तों पर ऋण, पुनर्भुगतान में छूट और कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराए. इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिरता बनाए रखने और व्यापार लागत कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं.
युद्ध के कारण पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भर उद्योग—जैसे प्लास्टिक, केमिकल्स, टेक्सटाइल और सेरेमिक—पहले ही प्रभावित हो चुके हैं. गैस की कमी और कच्चे माल की महंगाई ने कई छोटे उद्योगों को बंद होने की कगार पर पहुंचा दिया है. इसका सबसे गंभीर प्रभाव श्रमिकों पर पड़ रहा है, जिनका पलायन शुरू हो चुका है. यदि यह प्रवृत्ति बढ़ती है, तो न केवल औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि सामाजिक-आर्थिक असंतुलन भी गहराएगा.
यह समझना होगा कि एमएसएमई केवल आर्थिक इकाइयां नहीं हैं, बल्कि वे करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं. एक बार उत्पादन ठप होने पर उसे फिर से पटरी पर लाने में महीनों लग जाते हैं. इसलिए समय रहते हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी है. सरकार को वित्तीय सहायता के साथ-साथ वैकल्पिक उद्योगों—विशेषकर पेट्रोकेमिकल्स के विकल्पों,को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे वैश्विक संकटों का असर कम किया जा सके.
वर्तमान चुनौती अस्थायी जरूर है, लेकिन इसके प्रभाव दीर्घकालिक हो सकते हैं. इसलिए यह समय त्वरित, निर्णायक और दूरदर्शी नीति हस्तक्षेप का है. यदि देश के लघु और सूक्ष्म उद्योगों को इस संकट से सुरक्षित निकाल लिया गया, तो न केवल अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिलेगी, बल्कि भारत की विकास यात्रा भी अविराम बनी रहेगी.
