रमेश भान से
नई दिल्ली, 4 अप्रैल (वार्ता) वर्तमान पश्चिम एशिया संकट, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के विवाद को सुलझाने के लिए ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच मध्यस्थता करने की पाकिस्तान की महत्वाकांक्षाएं विफल होती दिख रही हैं क्योंकि खबरों के अनुसार ईरान ने इस्लामाबाद में वार्ता करने से इनकार कर दिया है। यद्यपि ईरान या अमेरिका-इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि ईरानी अधिकारियों के इस प्रक्रिया को खारिज करने और तेहरान के मध्यस्थों को औपचारिक रूप से सूचित करने के बाद कि वह इस्लामाबाद की वार्ता में भाग नहीं लेगा, पाकिस्तान की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लग गया है। इस कूटनीतिक गतिरोध के साथ, क्या इस्लामाबाद इस प्रक्रिया से बाहर है और भारत (ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में) इसमें शामिल होगा? यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है। दोनों पक्षों के सीधे बयानों से बढ़ते कूटनीतिक अलगाव का संकेत मिलता है।
ईरान के विदेश मंत्रालय और मुंबई स्थित इसके महावाणिज्य दूतावास ने पाकिस्तान के नेतृत्व वाली किसी भी मध्यस्थता में भाग लेने से इनकार किया है। ईरान ने पहले ही ट्रंप प्रशासन की 15-सूत्रीय शांति योजना को खारिज कर दिया है, जो इस्लामाबाद के माध्यम से तेहरान भेजी गई थी। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा, “पाकिस्तान के मंच उनके अपने हैं, हमने उनमें भाग नहीं लिया।” उन्होंने मध्यस्थों (पाकिस्तान) के माध्यम से दिये गये अमेरिकी प्रस्तावों को “अत्यधिक, अनुचित और अवास्तविक” बताकर खारिज कर दिया है। दूसरी ओर, पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उप-प्रधानमंत्री इशाक डार ने शुरू में “सार्थक वार्ता” की मेजबानी के लिए तत्परता व्यक्त की थी और दावा किया था कि वाशिंगटन और तेहरान दोनों ने इस्लामाबाद की भूमिका पर विश्वास जताया है।
पाकिस्तान विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने 2 अप्रैल को अपने प्रयासों में कुछ “बाधाओं” को स्वीकार किया, हालांकि उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद अपना कूटनीतिक प्रयास जारी रखेगा। पाकिस्तान की मध्यस्थता विफल होने की खबरें केवल अटकलों पर नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों पर आधारित हैं। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ और अन्य प्रमुख समाचार माध्यमों के अनुसार, ईरान ने आधिकारिक तौर पर मध्यस्थों से कहा है कि वह इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों से मिलने का इच्छुक नहीं है।
अब तुर्की और मिस्र के दोहा या इस्तांबुल जैसे स्थानों पर संभावित भूमिका तलाशने की खबरें हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की सार्वजनिक दूरी ने इन प्रयासों को “बंद गली” में पहुंचा दिया है। क्या भारत को आगे आना चाहिए? अप्रैल तक की स्थिति के अनुसार, एक मध्यस्थ के रूप में भारत की संभावित भूमिका को वैश्विक स्तर पर बड़ी रुचि के साथ देखा जा रहा है, लेकिन यह एक जटिल और उच्च जोखिम वाला कूटनीतिक निर्णय है। जहां कई देशों ने भारत से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है, वहीं भारत का वर्तमान दृष्टिकोण हाई-प्रोफाइल मध्यस्थता के बजाय संतुलित तटस्थता और शांत कूटनीति पर केंद्रित है।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने सार्वजनिक रूप से भारत से अपील की है कि वह 2026 के ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में शत्रुता को समाप्त करने के लिए एक सक्रिय और स्वतंत्र भूमिका निभाये। हालांकि भारत की इजरायल के साथ सामरिक साझेदारी है, इजरायली अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यद्यपि वे अन्य क्षेत्रीय देशों की तुलना में भारत पर अधिक भरोसा करते हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता अभी भी सैन्य उद्देश्यों को प्राप्त करना है। फिनलैंड के राष्ट्रपति जैसे नेताओं ने सुझाव दिया है कि अपनी वैश्विक साख के कारण भारत युद्धविराम कराने के लिए विशिष्ट स्थिति में है। ब्रिक्स की 2026 की अध्यक्षता भारत को युद्धरत पक्षों के बीच संवाद की सुविधा प्रदान करने के लिए एक औपचारिक मंच देती है। ब्रिक्स में ईरान और यूएई दोनों शामिल हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के कारण दांव पर लगी भारी आर्थिक राशि और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसके प्रभाव को देखते हुए, वर्तमान अध्यक्ष के रूप में भारत की भूमिका प्रासंगिक हो जाती है।
भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। इसलिए आर्थिक स्थिरता भारत का सीधा राष्ट्रीय हित है। भारत उन कुछ शक्तियों में से है जिसके तीनों पक्षों के साथ रणनीतिक संबंध हैं – रक्षा और तकनीक में इजरायल के साथ, चाहबहार बंदरगाह के माध्यम से ईरान के साथ, और अमेरिका के साथ (प्रमुख व्यापारिक भागीदार)। इन लाभों के बावजूद, कई बाधाएं भारत की प्रभावशीलता को सीमित करती हैं। ब्रिक्स स्वयं पश्चिम एशिया युद्ध पर विभाजित है। जहां रूस और चीन खुले तौर पर ईरान का समर्थन करते हैं, वहीं सऊदी अरब और यूएई ने तेहरान के कार्यों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया है। साथ ही, श्री ट्रंप की शैली बहुपक्षीय दृष्टिकोण के बजाय व्यक्तिगत कूटनीति की रही है। यदि वार्ता विफल होती है, तो औपचारिक मध्यस्थता से भारत के कुछ ब्रिक्स देशों के साथ संबंध बिगड़ने का जोखिम भी है। भले ही ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक अगले महीने होने वाली है, भारत ने युद्ध पर चर्चा के लिए कोई औपचारिक आपातकालीन बैठक नहीं बुलाई है। विदेश मंत्रियों की यह बैठक 14 और 15 मई को नई दिल्ली में होगी। यह नई दिल्ली के लिए एक कठिन कूटनीतिक परीक्षा होगी क्योंकि भारत, ईरान और यूएई दोनों की मेजबानी करेगा। इजरायल के साथ भारत के गहरे संबंधों ने भी इसकी पूर्ण तटस्थता को लेकर कुछ संदेह पैदा किये हैं।

