
सीधी।संजय टाइगर रिजर्व की बाघिन टी-54 ने संघर्षों के बाद जंगल में अपनी अनूठी पहचान बनाई है। दिसंबर 2020 में रेस्क्यू किए गए शावकों में से एक टी-54 जून 2024 में जंगल में छोड़े जाने के बाद अब पोंडी और बस्तुआ क्षेत्र में सफलतापूर्वक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। इस बाघिन की कहानी दिसंबर 2020 में शुरू हुई थी, जब बाघिन टी-3 के दो शावकों को ब्यौहारी बफर क्षेत्र से रेस्क्यू किया गया था। इन दोनों मादा शावकों को सुरक्षित रखने के लिए बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के एनक्लोजर में रखा गया था। एक साल बाद शावकों को जंगल में छोड़ा गया । लगभग एक साल बाद 2 दिसंबर 2021 को इन शावकों को जंगल में फिर से बसाने की योजना बनाई गई। एक शावक को सतपुड़ा टाइगर रिजर्व भेजा गया जबकि दूसरी को संजय टाइगर रिजर्व के मोहन रेंज में छोड़ा गया, जो बाद में टी-32 के नाम से जानी गई। वर्ष 2022 में टी-32 ने दो शावकों को जन्म दिया। हालांकि 12 मार्च 2023 को टी-32 की अचानक मौत हो गई, जिससे उसके दो छोटे शावक अनाथ हो गए। जंगल में उनके जीवित रहने की संभावना कम थी। इसके बाद, वन विभाग की टीम ने 17 मार्च 2023 को इन दोनों शावकों को रेस्क्यू कर दुबरी टाइगर एनक्लोजर में सुरक्षित रखा।
बाघिन टी-54 ने जंगल को बनाया सुरक्षित रहवास-
समय के साथ इन शावकों में से एक बाघिन टी -54 के रूप में विकसित हुई। जून 2024 में उसे रेडियो कॉलर लगाकर बस्तुआ क्षेत्र में छोड़ा गया। यह उसकी जंगल में वापसी और आत्मनिर्भरता की परीक्षा थी। लगभग दो वर्षों की निरंतर निगरानी और सुरक्षा के बाद टी-54 ने पोंडी और बस्तुआ क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। उसने साबित कर दिया है कि वह जंगल में न केवल जीवित रहने में सक्षम है, बल्कि पूरी तरह से स्थापित भी हो चुकी है।
टी-54 के मां बनने से वन विभाग में खुशी-
मार्च 2026 में जंगल में तीन नन्हें पगमार्क दिखने से बाघिन टी-54 के मां बनने के संकेत मिले, हालांकि शावक कैमरे में कैद नहीं हो सके, फिर भी वन विभाग में खुशी की लहर दौड़ गई। शुक्रवार को हुए स्वास्थ्य परीक्षण में टी-54 पूरी तरह स्वस्थ पाई गई, जिसे अधिकारियों ने वर्षों की मेहनत, सतत निगरानी और समर्पण का सफल परिणाम बताया।
