
सौसर। विश्व प्रसिद्ध चमत्कारिक श्री हनुमान मंदिर, जामसांवली धाम (हनुमान लोक) में हनुमान जन्मोत्सव के पावन अवसर पर भक्ति, विश्वास और सेवा का विराट संगम देखने को मिला। आयोजन के अंतिम दिन आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि समूचा क्षेत्र ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। बताया गया कि इस पावन पर्व पर लगभग छह लाख श्रद्धालुओं ने प्रभु के चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त किया। जानकारों के अनुसार यह महोत्सव न केवल एक आध्यात्मिक आयोजन रहा, बल्कि इसने सामाजिक एकता और सेवा का एक अनूठा संदेश भी दिया।
भजन संध्या और मध्यरात्रि महाभिषेक
जन्मोत्सव की पूर्व संध्या से ही भक्तों का सैलाब उमड़ने लगा था। प्रसिद्ध भजन गायिका स्वस्ती मेहूल ने अपनी सुमधुर प्रस्तुतियों से समां बांध दिया, जिससे श्रोता भक्ति में झूमने पर मजबूर हो गए। महोत्सव के मुख्य पड़ाव पर मध्यरात्रि को वाराणसी से आए विद्वान पंडितों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान हनुमान का महाभिषेक किया। इसके पश्चात हुई भव्य महाआरती ने पूरे परिसर को अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
विनम्रता ही सच्चा ज्ञान – जगदगुरु रामभद्राचार्य
पद्मविभूषण तुलसीपीठाधीश्वर जगदगुरु स्वामी रामभद्राचार्य महाराज के सानिध्य ने इस आयोजन को ऐतिहासिक ऊँचाई प्रदान की। श्रीराम कथा के दौरान महाराज जी ने लंका युद्ध और रावण के अहंकार के पतन का सजीव वर्णन किया। उन्होंने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक है जब उसमें विनम्रता हो। हनुमान जी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति दूसरों की सेवा में और सच्चा सुख प्रभु के स्मरण में निहित है। उन्होंने हनुमान जी और भरत जी के मिलन को भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप बताया और माता सीता के प्रति हनुमान जी के अनन्य प्रेम की व्याख्या की।
रामराज्य और आदर्श समाज की परिकल्पना
कथा के दौरान जगदगुरु ने रामराज्य को एक ऐसी आदर्श व्यवस्था बताया जहाँ न्याय, धर्म और करुणा का वास होता है। इस दौरान मुख्य यजमान के रूप में पूर्व मंत्री नानाभाऊ मोहोड, विधायक परिणय फूके और ट्रस्टी मनोहर शेलकी सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
चाक चौबंद रही प्रशासनिक व्यवस्था
लाखों की भीड़ के बावजूद मंदिर परिसर में व्यवस्था चाक-चौबंद रही। जगदगुरु ने संस्थान के अध्यक्ष गोपाल शर्मा, कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ, एसपी सुंदर सिंह कनेश, एडिशनल एसपी नीरज सोनी और प्रबंधकारिणी समिति की प्रशंसा की। श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह महाप्रसाद, शीतल पेय और शरबत के स्टाल लगाए गए थे। महाराज ने इस पावन भूमि की ऊर्जा को अलौकिक बताते हुए पुनः आगमन का संकल्प लिया और क्षेत्रवासियों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया।
