नयी दिल्ली, (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का काम पश्चिम बंगाल को छोड़कर ज्यादातर राज्यों में सुचारू रूप से चला है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एसआईआर पर लिखे एक लेख का जिक्र करते हुए कहा, “मैंने एसआईआर पर एक लेख पढ़ा। पश्चिम बंगाल को छोड़कर बाकी हर जगह यह काम सुचारू रूप से हुआ।”
पश्चिम बंगाल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि बंगाल में हालात कुछ ऐसे थे जिनमें कई असामान्य घटनाएँ देखने को मिलीं, जो दूसरे राज्यों में नहीं देखी गईं। उन्होंने बताया कि सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही भारत निर्वाचन आयोग ने एक ‘तार्किक विसंगति सूची’जारी की थी और इस प्रक्रिया के दौरान अजीब समय पर प्रशासनिक फ़ैसले लिए थे, जिनमें देर रात जारी की गई अधिसूचनाएँ भी शामिल थीं। उनका कहना था कि इन चीजों ने इस पूरी प्रक्रिया को और भी जटिल बना दिया।
न्यायालय की इस टिप्पणी के जवाब में कि संशोधन प्रक्रिया के बाद कुछ राज्यों में मतदाताओं की संख्या बढ़ गयी है, श्री बनर्जी ने कहा कि पिछली बार ऐसा संशोधन 2003 में हुआ था और यह बढ़ोतरी पिछले 20 सालों में हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण है। उन्होंने कहा, “ऐसा इसलिए है क्योंकि 2002 के बाद जनसंख्या बढ़ी है। बीस प्रतिशत की बढ़ोतरी कोई बड़ी बात नहीं है।”
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने उन न्यायिक अधिकारियों पर पड़े भारी दबाव को उजागर किया, जिन्हें संशोधन प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियों और दावों को निपटाने का काम सौंपा गया था। उन्होंने कहा कि लाखों की संख्या में आए मामलों को बहुत कम समय सीमा के भीतर निपटाना जरूरी था।
श्री बनर्जी ने भी इस चिंता से सहमति जताते हुए कहा कि इस प्रक्रिया की रफ्तार बहुत ज्यादा थी और इसे व्यावहारिक रूप से पूरा करना असंभव था। उन्होंने दोहराया कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली किसी भी प्रक्रिया के लिए आमतौर पर बहुत ज्यादा समय की जरुरतत होती है, जो दो से तीन साल तक चल सकता है।
पीठ ने यह भी माना कि पश्चिम बंगाल के हालात में कुछ अनोखी चुनौतियां थी, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालत का मुख्य उद्देश्य मतदान के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करना ही है। पीठ ने कहा कि हालांकि कुछ तार्किक या प्रशासनिक चिंताएं उठाई जा रही थीं, लेकिन समावेशी चुनावी सूचियां सुनिश्चित करने और मतदाताओं की भागीदारी को बढ़ावा देने का बड़ा उद्देश्य ही उसके दृष्टिकोण का आधार था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि उठाए गए कई मुद्दे प्रशासनिक प्रकृति के प्रतीत होते हैं और उनका समाधान उचित स्तर पर किया जा सकता है, जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय अथवा पुनरीक्षण प्रक्रिया की देखरेख करने वाले प्राधिकारी शामिल हैं।
