स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव हो

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ देश में एक बार फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बड़ा पर्व शुरू हो गया है. चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि यह जनता के विश्वास, भागीदारी और लोकतंत्र की मजबूती का सबसे बड़ा प्रतीक भी होते हैं. लेकिन इन घोषित चुनावों में सबसे अधिक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण चुनाव पश्चिम बंगाल के माने जा रहे हैं. इसकी वजह वहां की चुनावी हिंसा का लंबा और चिंताजनक इतिहास है.

पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा लगभग एक स्थायी समस्या बन चुकी है. चुनाव प्रचार के समय राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच झड़पें होना, मतदान के दिन बूथों पर कब्जा करने या मतदाताओं को डराने-धमकाने की घटनाएं सामने आना और चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भी प्रतिशोध की हिंसा होना वहां की राजनीतिक संस्कृति का दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा बन गया है. कई बार यह हिंसा इतनी गंभीर हो जाती है कि आम मतदाता भय और असुरक्षा की भावना से मतदान केंद्र तक जाने से भी हिचकने लगता है. लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि नागरिक को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए भी भय से मुक्त वातावरण न मिले.

दिलचस्प तथ्य यह है कि देश के कई ऐसे राज्य, जिन्हें कभी सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता था, वहां आज अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न हो रहे हैं. जम्मू-कश्मीर जैसे लंबे समय तक आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्र में भी अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया काफी हद तक शांतिपूर्ण ढंग से पूरी हो रही है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जटिल सामाजिक समीकरण वाले राज्यों में भी चुनाव आयोग की सख्ती और प्रशासनिक सतर्कता के कारण चुनावी हिंसा पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है. यहां तक कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी चुनाव पहले की तुलना में कहीं अधिक शांतिपूर्ण हो गए हैं.

इसके विपरीत पश्चिम बंगाल की स्थिति अलग दिखाई देती है. चाहे लोकसभा चुनाव हों, विधानसभा चुनाव हों, पंचायत चुनाव हों या स्थानीय निकायों के चुनाव, लगभग हर चुनाव के साथ हिंसा की खबरें जुड़ी रहती हैं. इस वजह से यह धारणा बन गई है कि पश्चिम बंगाल देश का शायद एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बिना हिंसा के चुनाव की कल्पना भी कठिन लगती है. यह स्थिति न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बल्कि राज्य की सामाजिक समरसता के लिए भी चिंताजनक है.ऐसे में पश्चिम बंगाल में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराना चुनाव आयोग के लिए बड़ी परीक्षा से कम नहीं है. आयोग को सुरक्षा बलों की पर्याप्त तैनाती, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, चरणबद्ध मतदान और कड़ी प्रशासनिक निगरानी जैसे उपायों को पूरी गंभीरता से लागू करना होगा. केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी और कड़ी चुनावी निगरानी से मतदाताओं में विश्वास पैदा करना भी उतना ही जरूरी है.

हालांकि यह भी उतना ही सच है कि केवल प्रशासनिक उपायों से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता. राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है. लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन यदि वह हिंसा और प्रतिशोध की संस्कृति में बदल जाए तो यह लोकतंत्र के मूल्यों को कमजोर कर देती है. इसलिए सभी दलों को यह समझना होगा कि चुनावी जीत-हार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा और जनता का विश्वास है.पश्चिम बंगाल की पहचान लंबे समय तक बौद्धिक विमर्श, राजनीतिक चेतना और सांस्कृतिक जागरूकता के केंद्र के रूप में रही है. ऐसे राज्य में यदि चुनाव हिंसा का पर्याय बन जाएं तो यह केवल राजनीतिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी है. इसलिए जरूरी है कि इस बार के चुनाव एक नई परंपरा की शुरुआत करें, जहां मतदाता निर्भय होकर मतदान कर सकें और लोकतंत्र की असली ताकत मतपेटी के माध्यम से सामने आए. बहरहाल,इस बार सभी पांच राज्यों में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव संपन्न होते हैं, तो यह न केवल चुनाव आयोग की बड़ी सफलता होगी बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और मजबूती का भी एक महत्वपूर्ण प्रमाण बनेगा. यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली जीत होगी.

 

 

Next Post

बेसमेंट में गंदगी पाये जाने पर होटल पर 25 हजार रूपये का जुर्माना

Tue Mar 17 , 2026
जबलपुर:शहर की स्वच्छता रैंकिंग सुधारने और आम नागरिकों को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराने के लिए नगर निगम सक्रियता के साथ कार्य कर रहा है। निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार के कड़े निर्देशों के बाद अब उन व्यावसायिक संस्थानों पर शिकंजा कसा जा रहा है जो स्वच्छता नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। […]

You May Like