नयी दिल्ली, 16 मार्च (वार्ता) दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के उस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है, जिसमें आबकारी नीति मामले को न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से किसी अन्य न्यायाधीश को स्थानांतरित करने के उनके अनुरोध को खारिज कर दिया गया था।
याचिका में न्यायमूर्ति शर्मा के नौ मार्च के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें मामले की जांच करने वाले केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) अधिकारी के खिलाफ जांच की मांग करने वाले निचली अदालत के निर्देश पर रोक लगा दी गयी थी।
श्री केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से मामले को स्थानांतरित करने के उनके अनुरोध को खारिज करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय के 13 मार्च के प्रशासनिक निर्णय पर सवाल उठाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 का सहारा लिया है। उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री ने श्री केजरीवाल को सूचित किया था कि मामला मौजूदा रोस्टर के अनुसार न्यायमूर्ति शर्मा को सौंपा गया था और हटने के संबंध में कोई भी निर्णय न्यायाधीश को स्वयं लेना होगा।
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने कहा कि उन्हें प्रशासनिक स्तर पर याचिका के स्थानांतरण का आदेश देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले।
यह विवाद दिल्ली आबकारी नीति मामले से जुड़ी कार्यवाही से उत्पन्न हुआ है। एक निचली अदालत ने 27 फरवरी को श्री केजरीवाल और 22 अन्य को मामले में आरोपमुक्त कर दिया था। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने बाद में उस आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी, जहाँ न्यायमूर्ति शर्मा द्वारा मामले की सुनवाई की जा रही है।
उच्च न्यायालय ने नौ मार्च को सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका पर नोटिस जारी किया और मामले की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही का आदेश देने वाले निचली अदालत के निर्देश पर रोक लगा दी। उसी आदेश में, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत को संबंधित धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) मामले में कार्यवाही स्थगित करने के लिए भी कहा और प्रथम दृष्टया यह टिप्पणी की कि आरोपमुक्त करते समय निचली अदालत द्वारा दर्ज किए गए कुछ निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण प्रतीत होते हैं।
मुख्य न्यायाधीश को 11 मार्च को लिखे एक पत्र में, श्री केजरीवाल ने आशंका व्यक्त की थी कि यदि मामला उसी न्यायाधीश के समक्ष जारी रहता है, तो सुनवाई में पूर्ण निष्पक्षता नहीं रह सकती है। उन्होंने उच्च न्यायालय द्वारा दी गई अंतरिम रोक और पीएमएलए के तहत कार्यवाही को प्रभावित करने वाले निर्देश की ओर इशारा किया, जबकि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अदालत के समक्ष पक्षकार भी नहीं था। केजरीवाल के अनुसार, शुरुआती चरण में दी गई राहत की प्रकृति ने कार्यवाही की निष्पक्षता के बारे में चिंताएं बढ़ा दी हैं।
श्री केजरीवाल ने यह भी कहा कि इस स्तर के मामलों में, अदालतें आमतौर पर पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए कई हफ्तों का समय देती हैं और जिस तरह से कार्यवाही की गई, उसने पक्षपात की उनकी आशंका को और मजबूत किया है। उन्होंने बताया कि उसी न्यायाधीश ने पहले भी आबकारी नीति विवाद से उत्पन्न कई मामलों की सुनवाई की थी और मामले के तथ्यों पर विस्तृत प्रथम दृष्टया विचार व्यक्त किए थे, जिनमें से कुछ को बाद में उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया था।
अब उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के निर्णय के साथ-साथ आबकारी नीति मामले में पारित अंतरिम आदेश की वैधता की भी जांच करेगा।
