दिल्ली डायरी
प्रवेश कुमार मिश्र
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा उम्मीदवार बनने के निर्णय को भले ही व्यक्तिगत बताया जा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि उनके निर्णय से बिहार की राजनीति में अचानक उथल-पुथल मच गई है. नीतीश के निर्णय से जदयू का एक बड़ा खेमा असंतुष्ट होकर इसके पीछे कोई बड़ी साजिश मान रहा है तो दूसरा खेमा इसे नीतीश कुमार द्वारा बेटे निशांत कुमार के राजनीतिक भविष्य के लिए बड़ा दांव मान रहा है जबकि राजनीतिक गलियारों में इस निर्णय की समीक्षा बहुस्तरीय दृष्टिकोण से की जा रही है. चर्चा है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपाई रणनीतिकारों की बड़ी योजना छिपी हुई है. नीतीश के गिरते स्वास्थ्य और सत्ता पर ढीली होती उनकी पकड़ को ध्यान में रखते हुए जदयू के कुछ वरिष्ठ नेताओं व भाजपाई रणनीतिकारों द्वारा सत्ता-हस्तांतरण के बेहतर विकल्प के रूप में इस रास्ते को चुना गया. हालांकि अभी भी बिहार से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार सत्ता की चाबी अपने हाथों से जाने देने को तैयार नहीं हैं संभवतः इसी वजह से नीतीश कुमार भाजपा के बजाय जदयू के किसी विश्वस्त सहयोगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने पर अड़े हुए हैं. जबकि भाजपा जदयू को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी देने की पेशकश कर रही है.
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपाई नेताओं की नजर
नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा उम्मीदवार बनने के बाद बिहार के तमाम वरिष्ठ भाजपाई नेताओं की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लग गई है. हालांकि जिन नेताओं का नाम मीडिया में बढ़-चढ़कर चल रहा है वे पार्टी के चौंकाने वाले निर्णय से परेशान होकर दबे जुबान से अपनी दावेदारी का खंडन भी कर रहे हैं. उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी,विजय सिन्हा, केन्द्रीय राज्यमंत्री नित्यानंद राय, गिरिराज सिंह, सतीश चन्द्र दुबे, वरिष्ठ विधायक प्रेम कुमार, पूर्व अध्यक्ष व सांसद संजय जायसवाल, दिलीप जायसवाल, शहनवाज हुसैन,जनक राम, संजीव चौरसिया, मैथिली ठाकुर जैसे नामों की चर्चा बिहार से दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में खुब सुनाई दे रही है लेकिन उक्त सभी नेता मीडिया से बचते दिख रहे हैं. ऐसे नेताओं का तर्क है कि जब भी मीडिया में किसी का बढ़-चढ़कर नाम चलता है उसका पत्ता कट जाता है और पार्टी चौंकाने वाली निर्णय कर लेती है. इसीलिए बिहार भाजपा के नेता कुर्सी की चाहत रखने के बावजूद बच बच कर बोल रहे हैं.
भाजपा का “मिशन केरलम 2026”
भाजपा केरल में अपना पैर जमाने के लिए तीन महत्वपूर्ण एजेंडे पर काम कर रही है. विकसित केरल, सुरक्षित केरल और आस्था का संरक्षण जैसे मुद्दों के सहारे केरल के एक खास वर्ग के वोटरों को रिझाने की तैयारी में लगी हुई है. चर्चा है कि गृहमंत्री अमित शाह की विशेष निगरानी में मिशन केरलम को आगे बढ़ाया जा रहा है. चर्चा है कि हिंदू मतदाताओं के साथ-साथ ईसाई मतदाताओं को केन्द्र में रखकर आपसी विश्वास की कमी को दूर करने के लिए ‘स्नेह यात्रा’ जैसे संपर्क अभियान चलाते हुए अपने को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने में जुटी है. दिल्ली में केरल के वरिष्ठ नेता सुरेश गोपी व राजीव चंद्रशेखर के साथ भाजपा लगातार समीक्षा बैठक कर रही है.
कांग्रेस की आक्रामक रणनीति से असम में फंसा पेंच
असम की राजनीति लड़ाई अब भाजपा के लिए एकतरफा नहीं है बल्कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के आक्रामक सक्रियता से ऊपरी व निचले असम के बीच की दूरी को पाटकर कांग्रेस अपने लिए बेहतर स्थिति बनाने लग गई है. कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर भाजपा को समय रहते चुनौती दी है. हालांकि कांग्रेसी व भाजपाई रणनीतिकार दिल्ली से लगातार प्रचार अभियान पर नजर रखें हुए हैं. बगैर चुनाव घोषणा हुए उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया भी अंतिम दौर में है. चर्चा है कि पश्चिम बंगाल व असम को लेकर भाजपा एक जैसी रणनीति बना रही है जबकि कांग्रेस को पश्चिम बंगाल से ज्यादा असम से उम्मीद है इसलिए वह असम पर फोकस कर रही है.
कोर्ट से राहत मिलने के बाद आक्रामक हुए केजरीवाल
आबकारी नीति मामले में बरी होने के बाद दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पुनः आक्रामक अंदाज में भाजपा पर निशाना साध रहे हैं. जहां एक तरफ केजरीवाल ने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं पर राजनीति साजिश के तहत उन्हें और उनके दल को खत्म करने के प्रयास का आरोप लगाया वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार व गुजरात सरकार की नीतियों को आधार बनाकर दोनों सरकारों को घेरने का प्रयास किया है. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में केजरीवाल की चुप्पी के बाद पुनः पुराने अंदाज में लौटने की चर्चा जोरों पर है
