गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 26 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग को नहीं मिली गर्भपात की अनुमति, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद अदालत ने जताई जान का खतरा

अहमदाबाद | गुजरात हाई कोर्ट ने वडोदरा की एक दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग द्वारा अपने 26 सप्ताह के भ्रूण को गिराने की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने वडोदरा के एसएसजी (SSG) अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला सुनाया। डॉक्टरों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि गर्भधारण के इस उन्नत चरण में गर्भपात कराना नाबालिग के लिए सामान्य प्रसव की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थिति में प्रक्रिया अपनाने से नाबालिग की जान को गंभीर खतरा हो सकता है और यदि बच्चा जीवित पैदा होता है, तो उसे वेंटिलेटर सपोर्ट जैसी जटिलताओं की आवश्यकता होगी।

गर्भपात की अनुमति न देते हुए अदालत ने नाबालिग के भविष्य और सुरक्षा के लिए राज्य सरकार को कड़े निर्देश जारी किए हैं। हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि नाबालिग की डिलीवरी का पूरा खर्च सरकार वहन करेगी और जन्म के बाद छह महीने तक मां और बच्चे की देखभाल व इलाज की जिम्मेदारी भी प्रशासन की होगी। यदि पीड़िता अपने परिवार के साथ नहीं रहना चाहती, तो उसे सरकारी महिला आश्रय गृह में रखने की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही, प्रसव के बाद यदि पीड़िता की इच्छा हो, तो बच्चे को किसी अधिकृत दत्तक ग्रहण एजेंसी (Adoption Agency) को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

अदालत ने केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि पीड़िता के पुनर्वास पर भी जोर दिया है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को आदेश दिया गया है कि वे नाबालिग की आगे की शिक्षा और उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) की उचित व्यवस्था करें। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि पूरी प्रक्रिया की निगरानी DLSA के सचिव करेंगे ताकि पीड़िता को किसी भी प्रकार की मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना का सामना न करना पड़े। याचिकाकर्ता के वकील भौमिक शाह ने बताया कि अदालत का यह निर्णय पूरी तरह से मेडिकल बोर्ड द्वारा बताए गए चिकित्सकीय जोखिमों पर आधारित है।

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