नयी दिल्ली, 12 मार्च (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परपोते आशीष राय की उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें नेताजी के पार्थिव अवशेषों को भारत लाने के निर्देश देने की मांग की गयी थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस मामले में परपोते के बजाय नेताजी की बेटी और उनकी एकमात्र उत्तराधिकारी को स्वयं अदालत के सामने आना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने जब अदालत को बताया कि नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ ऑनलाइन उपस्थित हैं और इस याचिका का समर्थन कर रही हैं तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पांचोली की पीठ ने कहा कि उन्हें ‘पर्दे के पीछे’ से समर्थन देने के बजाय बतौर उत्तराधिकारी खुद याचिका दायर करनी चाहिए। इस समय 84 वर्षीय अनीता बोस ऑस्ट्रिया में रहती हैं।
सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बताया कि ऐसी याचिकाएं पहले भी खारिज की जा चुकी हैं। इसमें 2024 की हालिया याचिका भी शामिल है। इसके जवाब में श्री सिंघवी ने तर्क दिया कि पिछली याचिकाओं में नेताजी के जीवित होने या उनके ठिकाने की जांच की मांग की गयी थी, जबकि वर्तमान याचिका केवल उनके अवशेषों (अस्थियों) को वापस लाने पर केंद्रित है।
जब शीर्ष अदालत ने अस्थियों की स्थिति पर सवाल किया तो सिंघवी ने बताया कि कई भारतीय नेता जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में नेताजी को श्रद्धांजलि दे चुके हैं, जहां उनकी अस्थियां सुरक्षित रखी गयी हैं।
पीठ ने नेताजी को देश के महानतम नायकों में से एक बताते हुए उनके प्रति सम्मान प्रकट किया, लेकिन परिवार के भीतर संभावित मतभेदों का उल्लेख करते हुए उत्तराधिकारी के सीधे शामिल होने पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि अदालत उनकी भावनाओं का सम्मान करती है और उन्हें कानूनी कार्रवाई में बदलने के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए उत्तराधिकारी को स्वयं आगे आना होगा। जब न्यायालय ने अनीता बोस फाफ को ऑनलाइन सुनने से इनकार कर दिया तो श्री सिंघवी ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, ताकि नेताजी की बेटी स्वयं अदालत का रुख कर सकें।
उच्चतम न्यायालय ने इस मामले के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि इससे पहले 2014 में नेताजी के लापता होने से जुड़ी एक जनहित याचिका को 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ खारिज कर दिया गया था। इसी तरह, 2022 में नेताजी की जयंती को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग वाली याचिका भी यह कहते हुए खारिज कर दी गयी थी कि नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि उनकी तरह समर्पण के साथ काम करने में है जो उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रदर्शित की थी।
