नई दिल्ली | मध्य-पूर्व में जारी भीषण सैन्य संघर्ष और ईरान-इजरायल युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाहाकार मचा दिया है। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 30% से अधिक की रिकॉर्ड तोड़ तेजी दर्ज की गई, जो साल 2020 के बाद का सबसे बड़ा उछाल है। अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) $118.21 और ब्रेंट क्रूड $118.22 प्रति बैरल के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान में नेतृत्व परिवर्तन और युद्ध के लंबे खिंचने के संकेतों ने निवेशकों के बीच भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बज गई है।
इस संकट का सबसे बड़ा कारण दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) से होने वाली सप्लाई का पूरी तरह बाधित होना है। हालांकि सऊदी अरब वैकल्पिक मार्गों से शिपमेंट बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। इसके अलावा, लेबनान की राजधानी बेरूत में बढ़ते हमलों और अमेरिकी राष्ट्रपति के कड़े बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल आपूर्ति श्रृंखला में आया यह अवरोध वैश्विक ऊर्जा मानचित्र को पूरी तरह बदल सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में लगी इस आग का सीधा असर परिवहन लागत और दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ना तय है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और रुपये की वैल्यू और भी गिर सकती है। वैश्विक शेयर बाजारों में पहले ही बड़ी गिरावट देखी जा चुकी है। यदि यह तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल के भारी भरकम बिलों का सामना करना पड़ेगा, जो वैश्विक विकास दर को धीमा कर सकता है।

