हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार रवि शंकर शर्मा ने संघर्ष और मेहनत से अपनी पहचान बनाई। इलेक्ट्रीशियन से शुरू हुआ उनका सफर उन्हें बॉलीवुड के सफल संगीतकारों में ले गया।
हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसे संगीतकार हुए, जिनके सुर आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं। उन्हीं महान संगीतकारों में एक नाम है रवि शंकर शर्मा का, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री में ‘रवि’ के नाम से जाना जाता है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि मेहनत, जुनून और संघर्ष से कोई भी इंसान बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उनके संघर्ष और सफलता की कहानी को याद कर रहे हैं।
3 मार्च 1926 को दिल्ली में जन्मे रवि शंकर शर्मा का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। परिवार की जिम्मेदारियों के कारण उन्हें कम उम्र में ही पिता की मदद करनी पड़ी। इसी वजह से उन्होंने दिल्ली में इलेक्ट्रीशियन का काम भी किया। हालांकि, उनका मन हमेशा संगीत में ही रमता था। रवि ने कभी औपचारिक रूप से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा नहीं ली, लेकिन बचपन में पिता के भजन सुनते-सुनते उन्होंने सुरों की समझ विकसित कर ली। धीरे-धीरे उन्होंने खुद ही हारमोनियम बजाना सीख लिया और कई वाद्ययंत्रों में भी महारत हासिल कर ली।
सपनों के साथ मुंबई पहुंचे
रवि का सपना था कि वह प्लेबैक सिंगर बनें और फिल्म संगीत की दुनिया में नाम कमाएं। इसी सपने को लेकर साल 1950 में वे मुंबई पहुंचे। शुरुआत बेहद कठिन रही। उनके पास रहने का ठिकाना नहीं था। दिनभर स्टूडियो के चक्कर लगाते और रातें मलाड रेलवे स्टेशन पर सोकर गुजारते थे। करीब दो साल तक उनका संघर्ष यूं ही चलता रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
पहली सफलता ने बदल दी किस्मत
साल 1952 में उनकी मुलाकात मशहूर संगीतकार हेमंत कुमार से हुई। उन्होंने रवि को फिल्म आनंद मैथ में ‘वंदे मातरम’ के कोरस में गाने का मौका दिया। यहीं से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद 1955 में फिल्म अलबेली से उन्होंने बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाई। धीरे-धीरे उनका संगीत लोगों के दिलों में बसने लगा।
यादगार गीतों से रचा इतिहास
रवि की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे पहले गीत लिखवाते थे और फिर उसे संगीतबद्ध करते थे। इसी वजह से उनके गीत बेहद मधुर और लोकप्रिय बने। उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में चौदहवीं का चांद, वक़्त, गुमराह, दो बदन और हमराज शामिल हैं। उन्हें फिल्म घराना और खंडन के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। खास बात यह है कि गायक महेंद्र कपूर के कई सुपरहिट गाने रवि के संगीत में ही रिकॉर्ड हुए।
‘निकाह’ से की शानदार वापसी
1970 से 1982 के बीच रवि ने फिल्म संगीत से दूरी बना ली थी। लेकिन 1982 में बीआर चोपड़ा की फिल्म निकाह से उन्होंने शानदार वापसी की। इसके बाद उन्होंने मलयालम फिल्मों में ‘बॉम्बे रवि’ के नाम से भी संगीत दिया और वहां भी खूब लोकप्रियता हासिल की। 7 मार्च 2012 को मुंबई में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके सुर आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं।
