अनिश्चितताओं के दौर में आत्मनिर्भरता ही हर स्थिति से निपटने का मूलमंत्र : राजनाथ

नयी दिल्ली 06 मार्च (वार्ता) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा है कि अनिश्चितताओं के इस दौर में आत्मनिर्भरता ही प्रासंगिक और हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने का एकमात्र मार्ग है। श्री सिंह ने शुक्रवार को कोलकाता में रक्षा एवं समुद्री संवाद “सागर संकल्प – भारत का समुद्री गौरव ” का उद्घाटन करते हुए कहा , ” रक्षा क्षेत्र में आज अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हो रहा है, इसीलिए हमारी सरकार का शुरू से यह मानना रहा है कि इस अनिश्चितता के दौर में आपूर्ति श्रृंखला में बाधा से बचने का एक मात्र उपाय है ‘आत्मनिर्भरता’ और रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम हमारी आत्मनिर्भरता के विजन की एक प्रमुख धुरी है। इस कार्यक्रम का आयोजन गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) और एक निजी मीडिया संगठन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। रक्षा मंत्री ने कहा, “पुराने विचार, पुरानी वैश्विक व्यवस्था और पुरानी धारणाएं तेजी से बदल रही हैं। हमें इन अनिश्चितताओं को समझने की आवश्यकता है। पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति इसका प्रमुख उदाहरण है। वहां जो कुछ हो रहा है, वह असामान्य है। पश्चिम एशिया या हमारे पड़ोस में भविष्य की घटनाओं के बारे में ठोस टिप्पणी करना कठिन है। ” उन्होंने कहा कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य या समूचा फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब इस क्षेत्र में अशांति होती है तो इसका सीधा असर तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ता है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में भी आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती दिखाई दे रही है। इन अनिश्चितताओं का सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर पड़ता है। वैश्विक परिदृश्य एक असामान्य स्थिति में है, और इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि यह असामान्यता अब नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है।

श्री सिंह ने रक्षा उत्पादन को गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार द्वारा किए गए संरचनात्मक और नीतिगत सुधारों का उल्लेख किया। उन्होंने पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन, प्रदर्शन मानक और अनुसंधान एवं विकास पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम सरकार की आत्मनिर्भरता की दृष्टि के प्रमुख स्तंभ हैं। जहाज निर्माण क्षेत्र में जीआरएसई और अन्य शिपयार्डों को विशेष महत्व दिया गया है ताकि घरेलू औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत और भविष्य उन्मुख बनाया जा सके। उन्होंने कहा, “लक्ष्य यह है कि शिपयार्ड को केवल उत्पादन इकाइयों के बजाय प्राैद्योगिकी केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए। बुनियादी ढाँचे के आधुनिकीकरण, डिजिटल शिप डिजाइन उपकरणों, मॉड्यूलर निर्माण तकनीकों और सप्लाई चेन एकीकरण के माध्यम से इन्हें वैश्विक मानकों तक लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।”
रक्षा मंत्री ने रक्षा क्षेत्र में निजी उद्योग को समान अवसर प्रदान करने के लिए उठाए गए कदमों पर भी प्रकाश डाला। इनमें आयात-निर्यात प्रक्रियाओं में सुधार, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रयोगशालाओं की उपलब्धता, ग्रीन चैनल प्रमाणन की सुविधा, रक्षा गलियारों की स्थापना शामिल है। उन्होंने कहा कि ये कदम केवल सुविधा प्रदान करने के लिए नहीं बल्कि निजी क्षेत्र को अधिकतम प्रदर्शन के लिए सक्षम बनाने के उद्देश्य से उठाए गए हैं, ताकि सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की समान भागीदारी से देश का विकास सुनिश्चित हो सके। श्री सिंह ने कहा कि सरकार के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में घरेलू रक्षा उत्पादन ने 1.50 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड पार कर लिया, जबकि रक्षा निर्यात लगभग 24,000 करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। उन्होंने कहा कि अप्रैल 2026 तक रक्षा निर्यात लगभग 29,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है और सरकार ने वित्त वर्ष 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा उपकरण निर्यात का लक्ष्य रखा है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि अभी निजी उद्योग देश में निर्मित रक्षा प्लेटफॉर्म, उपकरण और सहायक सामग्रियों में लगभग 25 प्रतिशत योगदान दे रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में यह भागीदारी कुल रक्षा उत्पादन मूल्य का 50 प्रतिशत तक पहुँच जाएगी। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना के लिए ऑर्डर पर मौजूद सभी युद्धपोत और पनडुब्बियाँ भारतीय शिपयार्डों में ही डिजाइन, इंजीनियरिंग, निर्माण और जीवनचक्र समर्थन सहित तैयार की जा रही हैं। इसे उन्होंने आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी छलांग बताया। उन्होंने कहा, “आत्मनिर्भरता अब केवल नारा नहीं रही, यह एक व्यावहारिक वास्तविकता बन रही है। ‘बिल्डर नेवी’ अब केवल नारा नहीं बल्कि जमीनी हकीकत है।” श्री सिंह ने बड़े प्लेटफॉर्म के निर्माण में एमएसएमई, स्टार्ट-अप और स्वदेशी विक्रेताओं के योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि युद्धपोत सामूहिक प्रयासों का परिणाम होता है, जिसे “कांग्लोमरेट प्रभाव” भी कहा जाता है। यह प्रभाव समन्वय पैदा करता है, दक्षता बढ़ाता है, जोखिम कम करता है और नवाचार के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाता है। उन्होंने कहा कि भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने कई वित्तीय सहायता योजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें दीर्घकालिक वित्तपोषण के लिए विशेष तंत्र, उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नियम और सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल को प्रोत्साहन शामिल है। उन्होंने कहा कि समुद्री भारत विजन 2030 और समुद्री अमृत काल विजन 2047 के तहत विश्वस्तरीय जहाज निर्माण क्लस्टर विकसित करने के लिए लगभग 3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई गई है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि यदि देश समन्वित योजना, प्रौद्योगिकी के उपयोग और संस्थागत सहयोग के साथ आगे बढ़ता है तो भारत का समुद्री क्षेत्र सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत बनेगा। उन्होंने कहा, “भारतीय नौसेना की तत्परता, ऑपरेशन सिंदूर जैसे सफल अभियान और आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए कदम यह दर्शाते हैं कि भारत का रक्षा क्षेत्र सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि हम मिलकर इस समुद्री दृष्टि को आगे बढ़ाते हैं तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपने हितों की रक्षा करेगा बल्कि वैश्विक समुद्री स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। हमारा लक्ष्य 2030 तक भारत को दुनिया के शीर्ष 10 जहाज निर्माण देशों में शामिल करना और 2047 तक शीर्ष पाँच में पहुँचना है।”

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