मुंबई | वैश्विक मोर्चे पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आए अचानक उछाल ने भारतीय मुद्रा बाजार को हिला कर रख दिया है। बुधवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 69 पैसे की भारी गिरावट के साथ 92.18 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। मुद्रा विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य संघर्ष है, जिसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 82 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं।
होली के अवकाश के बाद जब आज बाजार खुला, तो दो दिनों का संचित वैश्विक दबाव रुपये पर साफ दिखाई दिया। रुपये के कमजोर होने का एक बड़ा कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से की जा रही लगातार बिकवाली भी है। आंकड़ों के मुताबिक, सोमवार को ही विदेशी निवेशकों ने 3,295.64 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। जब विदेशी निवेशक अपना पैसा निकालकर बाहर ले जाते हैं, तो वे डॉलर की मांग बढ़ाते हैं, जिससे घरेलू मुद्रा के मूल्य में भारी कमी आती है।
रुपये के इस ऐतिहासिक स्तर तक गिरने से भारत का आयात बिल काफी बढ़ जाएगा, जिसका सीधा असर महंगाई के रूप में आम आदमी पर पड़ेगा। कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे माल ढुलाई और दैनिक उपभोग की वस्तुएं महंगी होने की आशंका है। इसके अलावा, मोबाइल, लैपटॉप और अन्य विदेशी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दाम भी बढ़ सकते हैं। फिलहाल बाजार की नजरें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर टिकी हैं कि क्या केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप कर रुपये की इस गिरावट को थामने के लिए कदम उठाएगा।

