नयी दिल्ली, (वार्ता) राष्ट्रीय राजधानी में नीदरलैंड्स के राजदूत आवास का उद्यान एक बार फिर 50,000 खिले हुए ट्यूलिप्स की फूलों से महक उठा है और ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो केउकेनहोफ़ गार्डन ही यहीं पर आ गया है।
यहां पर लगाई गयी प्रदर्शनी ने विश्वप्रसिद्ध केउकेनहोफ़ गार्डन की झलक नयी दिल्ली में ही साकार कर दी है। फूलों की इस अनुपम प्रदर्शनी ने प्रकृति की सुंदरता को भारत-नीदरलैंड्स की सांस्कृतिक मित्रता के साथ पिरो दिया है।
राजदूत आवास इस भव्य पुष्पोत्सव का केंद्र बना। गौरतलब है कि जिस प्रकार कमल भारतीय संस्कृति की आत्मा से जुड़ा है, उसी तरह ट्यूलिप नीदरलैंड्स की पहचान का अभिन्न प्रतीक है। यह केवल एक मौसमी फूल नहीं, बल्कि आशा, उत्साह और नए वसंत के आगमन का संदेशवाहक है। ट्यूलिप की उत्पत्ति मध्य एशिया में हुई, जहां से इसे उस्मानी साम्राज्य ने अपनाया और 16वीं सदी में यह यूरोप पहुंचा। समय के साथ यह फूल डच संस्कृति में इतनी गहराई से रच-बस गया कि बागों की शोभा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय प्रतीक बन गया।
मौजूदा समय में दुनिया भर में ट्यूलिप की 3,000 से अधिक आधिकारिक किस्में पंजीकृत हैं जिसमें साधारण एकरंगी फूलों से लेकर दुर्लभ और आकर्षक रूपों तक शामिल हैं। लोकप्रियता के चरम पर पहुंचने के दौरान कई किस्मों को ‘एडमिरल’ और ‘जनरल’ जैसे सम्मानजनक नाम दिए गये हैं।
वहीं कुछ का नाम ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर रखा गया। नीदरलैंड्स में 17वीं सदी में ट्यूलिप की दीवानगी इतनी बढ़ी कि “ट्यूलिप मैनिया” का दौर शुरू हो गया। दुर्लभ कंदों की खरीद-फरोख्त एम्स्टर्डम स्टॉक एक्सचेंज में घर की कीमत के बराबर तक पहुंच गई थी। हालांकि वह उन्माद धीरे-धीरे थम गया, लेकिन ट्यूलिप की लोकप्रियता दुनिया भर में फैलती चली गई। आज यह फूल विभिन्न महाद्वीपों में आयोजित वसंत उत्सवों का प्रमुख आकर्षण है।
नीदरलैंड्स की राजदूत मारिसा जेरार्ड्स और उनके पति पीटर नूप ने अपने आवास और उद्यान के द्वार अतिथियों के लिए दिल खोलकर स्वागत किया और भारत और नीदरलैंड्स की प्रगाढ़ मित्रता का उत्सव मनाया। सुश्री जेरार्ड्स कहा, “यह उत्सव भारत और नीदरलैंड्स के बीच जीवंत साझेदारी का प्रतीक है। हमारे बगीचे में खिले ट्यूलिप सहयोग और साझा विकास की उस भावना को दर्शाते हैं, जो आज हमारे संबंधों की पहचान है। इस महोत्सव के दूसरे संस्करण के साथ हमें प्रसन्नता है कि यह एक वार्षिक परंपरा बनता जा रहा है, जो दोनों देशों के समुदायों को और करीब ला रहा है तथा इंडो-डच संबंधों की गर्माहट को रेखांकित करता है।”
