श्रीनगर | पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के सात साल पूरे होने पर जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा रहे हैं। साल 2019 में जैश-ए-मोहम्मद द्वारा किए गए उस कायराना हमले के बाद, सुरक्षा बलों ने अपनी ड्रिल और आतंकवाद विरोधी रणनीतियों को पूरी तरह आधुनिक बना दिया है। दक्षिण कश्मीर के त्राल और शोपियां जैसे इलाकों में, जो कभी कट्टरपंथ के गढ़ माने जाते थे, अब स्थिति सामान्य हो रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि अब हिंसा का वह चक्र थम गया है जिसमें परिवार अपने प्रियजनों को खो देते थे; स्कूल-कॉलेज नियमित खुल रहे हैं और किसानों की उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है।
सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच नेशनल हाईवे-44 पर आम लोगों को कुछ दिक्कतों का सामना भी करना पड़ रहा है। पुलवामा हमले के बाद से सेना के काफिले की सुरक्षित आवाजाही के लिए विशिष्ट कट-ऑफ समय और सुरक्षा चेकपॉइंट्स लगाए गए हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक जस्टिस (रिटायर्ड) हसनैन मसूदी ने इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि काफिले के गुजरने के दौरान निजी वाहनों को रोके जाने से मरीजों और स्थानीय यात्रियों को परेशानी होती है। उन्होंने मांग की है कि केंद्र सरकार को सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं के बीच बेहतर संतुलन बनाने के लिए इन तकनीकी बाधाओं पर विचार करना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले सात वर्षों में आतंकवाद की प्रकृति में बदलाव आया है। अब सीमा पार से संचालित संगठन लंबे समय तक युद्ध लड़ने के बजाय भारतीय राष्ट्र को मनोवैज्ञानिक रूप से झकझोरने वाले हमलों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। पुलवामा का हमला स्थानीय कट्टरता और सीमा पार आतंकवाद के जटिल गठजोड़ का परिणाम था, जिसने सुरक्षा एजेंसियों को रोकथाम की नई रणनीतियां बनाने पर मजबूर किया है। अब आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए न केवल सैन्य कार्रवाई, बल्कि समुदाय की भागीदारी और स्थानीय युवाओं के विश्वास को जीतने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

