रूधे गले,डबडबाई आंखे के साथ गूंज रहे गगनभेदी जयकारों के बीच दी महाराज जी को अंतिम विदाई

सतना:पहाडों के बीच घने जंगल से पैदल गुजर रहे भक्तों में सिर्फ ब्रम्हलीन हुए परमहंस स्वामी सच्चिदानन्दमहाराज की एक झलक पाने की ललक ऐसी कि वह हजारों की भीड़ का हिस्सा बनकर भी आंखों से गिर रहे आंसुओं को पोछने के वजाए उनके अन्तिम चित्र को अपने मन में स्थापित करने में लगा था.उसकी कोशिश थी कि वह अपने स्मृति पटल पर हर घटनाक्रम को कुछ ऐसे अंकित करें जो उसे शेष जीवन ऊर्जा देता रहे.

महाराज जी की विदाई में लोगों को हमेशा ढ़ाढस बधाने वाले संत, मंहत भी अपने भावुक क्षणों को छिपा नहीं पा रहे थे.स्थिति का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने गुरूभाई को विदाई देने के लिए आगे बढ़े परमहंस स्वामी अडगडानन्द जी महाराज को उनके शिष्यों ने पकड़ कर अलग किया.दो गुरूभाइयों की अन्तिम भेंट के इस दृश्य ने मौजूद सभी की आंखे भिगो दी.महाराज जी के सेवादारों की स्थिति यह थी कि वे पिछले दिन दिनों से सिर्फ इसी का इन्तजार कर रहे थे कि उन्हे कब आदेश मिले और वे उसके पालन में सक्रिय हो जाए.सब कुछ जिनकी आंखों के सामने हो रहा था वह जहां खडा था वहां से हिलना ही नहीं चाह रहा था.

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह चार बजे से विधि का शुभारंभ महाराज जी को तपोस्थली गुफा में ले जाने से हुआ.वहां पंच्यगव्य से स्नान के बाद वैदिक मंत्रों के उच्चारण से पूजा विधि की शुरूआत हुई.तकरीबन छह बजे तक चली इस प्रक्रिया के बाद उन्हे पुन:पुराने भवन स्थित बडे आश्रम लाया गया.जहां नवीन वस्त्रों के साथ पुन:आम जनों के दर्शनों के लिए स्थापित कर दिया गया.दोपहर 12 बजे के बाद जयकारों के घोष के साथ महाराज जी के पार्थिवदेह को ऊपर यानी समाधि स्थल के बाहर लाया गया.यहां पर भी आमजनों के दर्शन के लिए तीन बजे तक रखा गया. इस दौरान पूरे समय लोगों के आने का क्रम अनावृत्त जारी रहा.

कई बार मौजूद लोगों को व्यवस्था बनाने में दिक्कत आयी.पर भक्तों से उनके भगवान को ओझल नहीं किया गया.तीन बजे के बाद परमहंस आश्रम लमेटाघाट जबलपुर श्री श्री 1008 श्री जगमित्रानंद जी महाराज की देखरेख में महासमाधि का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ.इस कार्य में श्री श्री 1008 श्री रामाख्यानंद महाराज रामायण बाबा,एवं श्री श्री 1008 श्री विरत्तानंद महाराज वीरेन्द्र बाबा का भी सहयोग रहा.महाराज जी की पार्थिवदेह को सवा तीन बजे गर्भगृह में प्रवेश दिया गया.

इसके उपरान्त वैदिक मंत्रों के साथ उनकी समाधि की प्रक्रिया अनवृत्त पांच बजे तक चलती रही. चन्दन और कपूर के साथ समाधि में स्थापित किए गए महाराज जी के साथ वैदिक साहित्य ,महाराज जी के उपयोग की सामग्री व अन्य कई वस्तुएं रखी गई.इसके बाद समाधि को जयकारों के साथ हमेशा के लिए बन्द कर दिया गया.यह संयोग ही था कि जिस स्थान पर उन्हे समाधि दी गई है. वह कुछ दिनों पहले ही तैयार हुई थी.महाराज जी की इच्छा के अनुकूल उनके जीवनकाल में ही तैयार की गई समाधि में उनकी स्थापना उनकी स्मृतियों को चिरस्थाई बना दी है

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