
ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
निगम परिषद में सभापति की आसंदी पर कमल पुष्प खिला हुआ है, लेकिन जब भगवाधारी पार्षद ही नारेबाजी कर सभापति की आसंदी के नीचे धरना देकर बैठ जाएं तो अंदाज यही लगाया जाएगा कि भाजपा पार्षद दल में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। इसी दल के पार्षद बृजेश श्रीवास पहले भी पार्टी की गाइडलाइन के बजाए जनहित को तरजीह देने का दावा कर अपनी पार्टी को संकट में डालने वाले हालात पैदा करते रहे हैं। बीते तीन सालों से प्रतिनियुक्ति पर वजनदार पदों पर जमे अफसरों और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दे को तूल देकर इस बार वे सभापति की आसंदी के समक्ष धरने पर बैठे तो परिषद की बैठक खत्म होने के बाद भी घंटों तक उठने का नाम नहीं लिया। उन्हें अपनी ही पार्टी के देवीसिंह राठौर और मनोज यादव का भी साथ मिला। उनके इस इहतेजाज की गाज म्युनिसिपल के दो जोनल अफसरों पर गिरी जिनका न सिर्फ वेतन रोक दिया गया बल्कि उनकी तैनाती के दौरान बनाए बिलों की जांच का हुक्मनामा भी जारी हो गया। पदेन व्यवस्था को लेकर सदन में पहले भी एतराज उठते रहे हैं, इस बार सभापति ने कमिश्नर से कह दिया है कि इस संबंध में पूर्व में जो ठहराव हुए हैं, उन पर मुकम्मल अमल हो। फिलहाल, ग्वालियर निगम परिषद में करीब दर्जन भर एल्डरमैन की नियुक्ति का इंतजार किया जा रहा है। इन एल्डरमैनों के आने के बाद भाजपा पार्षद दल के समीकरण बदल जाएंगे। पिछली परिषद तक सिर्फ छह ही एल्डरमैन बनते थे, जिन्हें अब जस्ट डबल कर दिया गया है। वैसे ये एल्डरमैन ज्यादा अवधि तक पार्षदी का सुख नहीं भोग सकेंगे क्योंकि दो साल से भी कम अवधि में मौजूदा निगम परिषद का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है।
अनूप भी अब फ्रीस्टाईल बोल रहे
कभी ग्वालियर में सत्तापक्ष की मुख्यधारा के केंद्र बिंदु रहे अनूप मिश्रा फिलवक्त सियासत के हाशिए पर हैं। लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें न सत्ता में हिस्सेदारी मिली और न संगठन में एडजस्ट किया गया। लंबी उपेक्षा के दर्द ने उन्हें मुखर और बेलाग बना दिया है। वे इशारों ही इशारों में ऐसी बातें कह जाते हैं, जिनका निहितार्थ यही निकलता है कि उन्हें हाशिए पर धकेलने के लिए उन्हीं की पार्टी में गोलबंदी की गई। 2018 में भितरवार सीट से मिली हार का गम उन्हें अब तक है। बकौल, अनूप उन्हीं की पार्टी के मित्र नहीं चाहते थे कि वे चुनाव जीतें। 2023 में वे दक्षिण सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन उन्हें ग्वालियर पूर्व या भितरवार सीट ऑफर की गई, उन्होंने मना कर दिया। चार बार के विधायक, तीन सरकारों में मंत्री और एक दफा सांसद रह चुके अनूप संकेतों में यह कहने से भी नहीं चुके कि नरेन्द्र सिंह से अब उनके संबंध वैसे नहीं हैं, जैसे कई बरस पहले अन्ना और मुन्ना की जोड़ी के वक्त थे। सियासी गलियारों में अनूप को अन्ना और नरेन्द्र सिंह को मुन्ना कहा जाता रहा है। अनूप ने एक और रहस्य खोल दिया, वह यह कि साध्वी जब सीएम की कुर्सी छोड़कर गिरफ्तारी देने हुबली जा रहीं थीं तो अपनी जगह उन्हें ही सीएम बनाना चाहती थीं, वे कहते हैं कि यकीन नहीं तो गोपाल भार्गव, विश्नोई या कैलाश से पूछ लो…!
संघ के पूर्व प्रचारकों का वर्कआउट
जनहित पार्टी का गठन तीन बरस पहले अभय जैन जैसे आरएसएस के पूर्व प्रचारकों द्वारा यह कहकर किया गया था कि उन हिंदुत्ववादी मतदाताओं को एक सार्थक विकल्प देंगे जो वर्तमान राजनीतिक संस्कृति से असंतुष्ट हैं। भगवा झंडे को अपनाने वाली इस नई नवेली पार्टी ने चुनावों में भी भागीदारी की है लेकिन न भाजपा को नुकसान पहुंचा सकी और न कांग्रेस को। खुद को अभी भी संघ के स्वयंसेवक मानने वालों की यह नई सियासी जमात पिछले साल ग्वालियर में अपना कौमी इजलास भी कर चुकी है जिसमें देशभर से नुमाइंदे आए थे। बहरहाल, इस वक्त जनहित पार्टी का जिक्र इसलिए क्योंकि पार्टी के कार्यकर्ता इन दिनों भिंड के चंबल पुल से ग्वालियर तक पदयात्रा पर निकले हुए हैं, मांग भिंड ग्वालियर हाईवे को अपग्रेड करने की है। पार्टी को सवर्ण आर्मी का भी साथ मिला है। भिंड ग्वालियर हाईवे पर पिछले कुछ साल के दरम्यान सैकड़ों लोग सड़क हादसों में जान गंवा चुके हैं। मामला मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है। यही वजह है कि जनता में अपनी पैठ बढ़ाने जनहित के इस मुद्दे पर जनहित पार्टी वर्कआउट में जुटी है।
“साहब” को “महाराज” का इंतजार
ग्वालियर देहात के कांग्रेसी विधायक साहब सिंह को अभी भी महाराज के उस वादे के पूरा होने का इंतजार है जिसमें उन्होंने ग्वालियर के विकास के लिए धन लाने सभी जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर सीएम के पास चलने की बात कही थी। दो महीने पूरे होने को आए, अभी तलक वादा तो पूरा हुआ नहीं है। बहरहाल, साहब सिंह ने अब कह दिया है कि यदि महाराज का बुलावा नहीं आता है तो कांग्रेसी विधायक, महापौर और पार्षद खुद भोपाल जाकर सीएम से मुलाकात कर ग्वालियर के विकास के लिए आर्थिक पैकेज मांगेंगे।
