
नई दिल्ली। खेल संस्थाओं के संचालन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख जताते हुए कहा कि खेल संगठनों की बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में होनी चाहिए जिन्हें खेल की समझ और अनुभव हो। अदालत ने संकेत दिया कि क्रिकेट संघों में पूर्व और अनुभवी खिलाड़ियों की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि प्रशासनिक फैसले खेल हित में हों।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव पर बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। यह चुनाव 6 जनवरी को प्रस्तावित थे, लेकिन सदस्यता और चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठे विवादों के कारण रोक लगा दी गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संघ की सदस्य संख्या में अचानक हुई बढ़ोतरी पर भी सवाल उठाए। रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा गया कि कई दशकों तक सदस्य संख्या सीमित रही, लेकिन हाल के समय में बड़ी संख्या में नए नाम जुड़ना सवाल खड़े करता है। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि यदि सदस्य संख्या बढ़ानी थी तो खेल जगत के प्रतिष्ठित और सेवानिवृत्त खिलाड़ियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी।
दूसरी ओर, एसोसिएशन से जुड़े पक्ष की ओर से दलील दी गई कि सदस्यता प्रक्रिया की निगरानी एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति ने की थी और कई आवेदनों को नियमों के आधार पर निरस्त भी किया गया। साथ ही प्रशासक की नियुक्ति को लेकर भी आपत्तियां सामने आईं।
पूरा विवाद तब उभरा जब एक पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर ने चुनावी सूची में बड़े पैमाने पर नए सदस्यों को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिकाएं वापस लेने की अनुमति देते हुए सभी आपत्तियां बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष रखने को कहा और मामले के शीघ्र निपटारे पर जोर दिया।
गौरतलब है कि देश के प्रमुख राज्य क्रिकेट संघों में अभी भी बहुत कम ऐसे संघ हैं जिनकी कमान पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के हाथों में है, जबकि खेल प्रशासन में अनुभवी खिलाड़ियों की भूमिका को लगातार अहम माना जा रहा है।
