ममता बनर्जी ने एसआईआर, मुख्य चुनाव अधिकारी के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दर्ज की

कोलकाता, 01 फरवरी (वार्ता) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ बैठक के ठीक पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देते हुए निर्वाचन आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है।

विश्लेषक इस कदम को पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच बढ़ते टकराव के रूप में देख रहे हैं।

न्यायालय के सूत्रों के अनुसार, इस मामले पर इसी सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ बुधवार को राज्य के संबंधित ‘एसआईआर’ मामले की सुनवाई करने वाली है।

इससे पहले, तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डोला सेन और डेरेक ओ’ब्रायन के साथ कृष्णा नगर की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इसी मुद्दे पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन की ओर से दायर याचिकाओं को भी बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। सुश्री बनर्जी लगातार ‘एसआईआर’ पर आपत्ति जता रही हैं और इस संबंध में मुख्य चुनाव आयुक्त को पहले ही छह पत्र लिख चुकी हैं।

मुख्यमंत्री ने दिल्ली में बैठक से 48 घंटे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त को एक और पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग पर ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम’ के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया। विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री पत्रों और कानूनी मामले को एक साथ जोड़कर बैठक से पहले चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही हैं। सुश्री बनर्जी ने अपनी याचिका और पत्रों में आरोप लगाया कि ‘एसआईआर’ प्रक्रिया को मानवीय दृष्टिकोण के बिना थोपा गया है।

मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार, पश्चिम बंगाल में ‘एसआईआर’ अभ्यास के लिए लगभग 8,100 माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि इन माइक्रो-ऑब्जर्वर्स के पास पर्याप्त प्रशिक्षण की कमी है और वे इस तरह की संवेदनशील और कानूनी रूप से जटिल प्रक्रिया को संभालने के योग्य नहीं हैं, फिर भी उन्हें एकतरफा तरीके से तैनात कर दिया गया है।

सुश्री बनर्जी ने माइक्रो-ऑब्जर्वर्स द्वारा अनुचित हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि न तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और न ही 1960 के नियम मतदाता सूची संशोधन में माइक्रो-ऑब्जर्वर्स को कोई भूमिका या निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करते हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कानून के तहत, मतदाता सूची के रखरखाव, दावों और आपत्तियों की सुनवाई, दस्तावेजों के सत्यापन और नाम जोड़ने या हटाने पर अंतिम निर्णय से संबंधित शक्तियां पूरी तरह से मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) और सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के पास होती हैं। उन्होंने कहा कि ‘एसआईआर’ प्रक्रिया में माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की सक्रिय भागीदारी गैरकानूनी है।

 

 

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