अहंकार से मुक्ति और जिम्मेदारी का बोध कराती है मां नर्मदा

इंदौर: नर्मदा साहित्य मंथन के दूसरे दिन शनिवार को देशभर से आए विद्वानों ने अपनी बात रखी. विश्व संवाद केंद्र, मालवा और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला के तत्वावधान में यह आयोजन हो रहा है. दूसरे दिन इस पंचम साहित्य मंथन में नर्मदा नदी, सिनेमा और भारत, विश्व पटल पर भारत की चुनौतियां, भारतीय साहित्य और परिवार जैसे विषयों पर चिंतन हुआ.नर्मदा साहित्य मंथन के प्रथम सत्र में नर्मदा, तुम बहती रहो विषय पर तीन परिक्रमावासियों ने अपनी बात रखी.

मध्यप्रदेश के कैबिनेट मंत्री और नर्मदा परिक्रमावासी प्रहलाद पटेल ने कहा कि मां नर्मदा नदी मनुष्य को अहंकार से मुक्ति दिलाने के साथ ही जिम्मेदारी का बोध भी कराती है. नर्मदा नदी केवल हम लोगों के लिये एक नदी नहीं है, बल्कि वह हमारी मां है, जीवनदायिनी है. नर्मदा परिक्रमा मेरे लिये पुरखों की दी हुई परंपरा है. नर्मदा केवल एक शब्द नहीं है. जो नदी नर का मद यानी अहंकार हर ले वही नर्मदा नदी है. यदि मनुष्य हो अपने अहंकार से मुक्ति चाहिये तो उसे नर्मदा नदी की शरण में जाना ही होगा. नर्मदा नदी जिम्मेदारी का बोध भी कराती है. नर्मदा नदी का जल केवल जल नहीं है] बल्कि वह अमृत है. यदि यह अमृत रूकेगा तो सब कुछ रूक जाएगा. इस अमृत को बचाने का काम हमारा है.

विज्ञान से परे आत्मा का विषय
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलगुरू एंव नर्मदा परिक्रमावासी डॉ. राकेश सिंघई ने कहा कि नर्मदा नदी की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है. उसकी निरंतरता में ही वास्तव में हमारा जीवन है. नर्मदा नदी हमारी श्रृद्धा, भावना, धर्म और संस्कृति का प्रतीक है और उसे विज्ञान की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है. भारतीयों के अपने मूल्य बोध है, जो उन पर हावी भी है. ऐसे में नर्मदा नदी विज्ञान से परे आत्मा का विषय है. नर्मदा नदी के किनारे मानव सभ्यता का विकास भी हुआ और यह मानव को कई सीख भी देती है.
नर्मदा परिक्रमावासी और पत्रकार ओम द्विवेदी ने कहा कि नर्मदा माई विज्ञान का नहीं बल्कि आस्था का विषय है. नर्मदा माई को तर्कों से नहीं समझा जा सकता है. वह तो मन और विश्वास से जुड़ी हुयी है.

संस्कारवान परिवार भारत का मूल
द्वितीय सत्र में स्तंभकार और लेखक अनुपम मिश्र ने दृष्टि ही दृष्टांतः गाजा से कश्मीर विषय पर संवाद किया. तृतीय सत्र में जेम्स ऑफ बॉलीवुड प्लेटफॉर्म की प्रमुख श्रीमती स्वाति गोयल शर्मा ने भारत का सिनेमाः सिनेमा में भारत विषय पर अपनी बात रखी. चतुर्थ सत्र को जियो पोलिटिकल एनालिस्ट श्री आदि अंचित ने सम्बोधित किया. पंचम सत्र को संस्कृति के संवाहकः लोकगीत विषय पर साहित्यकार सुमन चौरे संबोधित किया. अंतिम सत्र में लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने भारतीय साहित्य और संस्कृति में परिवार विषय पर सम्बोधित करते हुए कहा कि जीवन-मूल्य परिवार की आधारशिला पर ही निर्मित होते हैं. आज संयुक्त परिवार व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिसका सीधा असर बच्चों की परवरिश पर दिखाई देता है. संस्कारवान परिवार भारत का मूल है. आदर्श परिवार बनाने के लिए भगवान श्री राम के चरित्र और रामायण को यथार्थ जीवन में उतरना होगा

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