
जबलपुर। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक कुमार सिंह तथा जस्टिस अजय कुमार निरंकारी ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आय से अधिक मामले में जांच एजेंसी पत्नी की व्यक्तिगत आय को सरकारी विभाग में पदस्थ पति की आय में जोडकर असेसमेंट नहीं कर सकती है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ अभियुक्त की स्वीकृति के आदेश तथा आगे की कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।
अधिवक्ता मीनाक्षी खरे तथा उसके पति आलोक खरे की तरफ से दायर की गयी याचिका में आय से अधिक सम्पति का गलत असेसमेंट करने तथा उनके खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति प्रदान किये जाने के खिलाफ उक्त याचिका दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि याचिकाकर्ता आलोक खरे वर्तमान में आबकारी विभाग में डिप्टी कमिश्नर में पद पर रीवा में पदस्थ है। याचिकाकर्ता मीनाक्षी पेशे से अधिवक्ता है और शादी के पहले से आयकर रिटर्न फाइल कर रही है। साल 2018 में लोकायुक्त ने आलोक खरे के घर तथा कार्यालय में दबिश दी थी। लोकायुक्त ने जांच में 4 सितम्बर 1998 से 15 अक्टूबर 2019 तक पिटीशनर की संपत्ति और खर्च से जुड़ा डेटा इकट्ठा किया था। लोकायुक्त के अनुसार याचिकाकर्ताओं के पास वैध आय स्त्रोत से लगभग 88.20 प्रतिशत अधिक संपत्ति मिली थी। लोकायुक्त ने उनके खिलाफ प्रकरण दर्ज कर लिया था और सरकार की तरफ से अभियोजन की स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है।
याचिका में कहा गया था कि लोकायुक्त के अनुसार याचिकाकर्ताओं के पास से 10 करोड 71 लाख रुपये की संपत्ति मिली थी। जबकि उनकी वैध आय 5 करोड़ 69 लाख रुपये थी। याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि अधिवक्ता होने के कारण मीनाक्षी की अच्छी-खासी आय थी और वह अपने परिवार की आर्थिक मदद करती थी। उन्होने अपनी आय से खेती की जमीन खरीदी और उससे इस अवधि के दौरान 4 करोड़ 81 लाख रुपये की आय हुई थी। दोनों याचिकाकर्ताओं की वैध आय को जोडकर देखा जाये तो 10 करोड़ 50 लाख रुपये है। जो सिर्फ लोकायुक्त द्वारा किये गये असेसमेंट से 21 लाख रुपये अधिक है। जो सिर्फ लगभग आय के वैध स्त्रोत से दो प्रतिशत अधिक है। आय के वैध स्त्रोत से 10 प्रतिशत से अधिक संपत्ति पाये जाने पर अभियोजन की अनुमति प्रदान नहीं की जा सकती है।
युगलपीठ ने अपने आदेष में कहा है कि याचिकाकर्ता महिला अधिवक्ता ने इनकम टैक्स रिटर्न के साथ-साथ खेती से हुई इनकम को ध्यान में रखा जाए, तो मंज़ूरी देने वाली अथॉरिटी को मंज़ूरी नहीं देनी चाहिए थी। प्रकरण को शुरू में ही खत्म कर देना चाहिए था। 18. “इनकम के जाने-पहचाने सोर्स” का मतलब ऐसी इनकम से है जो मध्य प्रदेश सिविल सर्विस रूल्स, 1965 के रूल 19 के अनुसार सही तरीके से बनाई गई हो। कानूनी टैक्स फाइलिंग से साबित हुई इनकम कानून की नज़र में “जानी-पहचानी” और जायज़ इनकम है। युगलपीठ ने अभियोजन स्वीकृति के विवादित मंज़ूरी ऑर्डर तथा आगे की कार्रवाई को रद्द कर दिया।
