नई दिल्ली | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त संरक्षणवादी नीतियों और ऊंचे टैरिफ ने दुनिया भर के व्यापारिक साझेदारों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। जहाँ अमेरिका अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने में जुटा है, वहीं भारत एक स्थिर और भरोसेमंद वैश्विक आर्थिक धुरी के रूप में उभरा है। 26 जनवरी 2026 को यूरोपीय संघ के साथ हुए ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (FTA) के बाद अब दुनिया की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी भारत की ओर रुख कर रही हैं। ब्रिटेन जहाँ चीन के साथ रिश्तों को सुधारने में जुटा है, वहीं वह अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार मान रहा है।
अमेरिका के करीबी सहयोगी रहे कनाडा और ग्लोबल साउथ के प्रमुख देश ब्राजील अब भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च के पहले सप्ताह में भारत दौरे पर आ रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य अगले दशक में अमेरिका के बाहर अपने निर्यात को दोगुना करना है। इसी तरह, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा भी फरवरी में एक बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत पहुँच रहे हैं। ट्रंप द्वारा कनाडा को ’51वां अमेरिकी राज्य’ कहे जाने वाले बयान के बाद ये देश अब रणनीतिक स्वायत्तता के लिए भारत को सबसे सुरक्षित बाजार मान रहे हैं।
इन नए वैश्विक गठबंधनों और भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से अमेरिका में बेचैनी साफ देखी जा रही है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने रूस से तेल खरीद को लेकर सवाल उठाए हैं, लेकिन भारत ने अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति पर कायम रहते हुए स्पष्ट कर दिया है कि उसके द्विपक्षीय संबंधों पर कोई दूसरा देश वीटो नहीं लगा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इसी गति से ईयू, कनाडा और ब्राजील के साथ अपनी ट्रेड डील्स को धरातल पर उतारता है, तो वह जल्द ही चीन के विकल्प के रूप में ग्लोबल बिजनेस का निर्विवाद किंग बनकर उभरेगा।

