चुनाव शुल्क पर केरल उच्च न्यायलय की टिप्पणी पर बीसीआई ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा पत्र

नयी दिल्ली, (वार्ता) भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को पत्र लिखकर केरल उच्च न्यायालय के एकल पीठ के राज्य विधिज्ञ परिषद चुनावों के लिए नामांकन शुल्क को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गयी मौखिक टिप्पणियों पर चिंता जतायी है।

बीसीआई अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने इन टिप्पणियों को ‘बेबुनियाद और लापरवाही भरा’ बताया। उन्होंने कहा कि इससे ‘बार एंड बेंच’ के बीच संवैधानिक संतुलन बिगड़ा है। परिषद ने बताया कि केरल उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के जरूरी निर्देशों के बावजूद याचिका पर सुनवाई की। निर्देश में सभी अदालतों को विधिज्ञ परिषद चुनावों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने से रोका गया था।

पत्र में कहा गया, “मैं सम्मानपूर्वक आपके समक्ष केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की कुछ निराधार और लापरवाह मौखिक टिप्पणियों पर भारतीय विधिज्ञ परिषद की गंभीर संस्थागत प्रतिक्रिया रखना चाहता हूं। ये टिप्पणियां राज्य विधिज्ञ परिषद के चुनावों के लिए निर्धारित नामांकन शुल्क को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गयी हैं, जबकि शीर्ष अदालत का स्पष्ट, बाध्यकारी और व्यापक रूप से प्रचारित निर्देश हैं कि सभी उच्च न्यायालय और अन्य अदालतें चुनाव संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई न करें।”

बीसीआई ने चेतावनी दी है कि उसे सही प्रशासनिक कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इसमें उन न्यायाधीशों के तबादले की मांग भी शामिल है, जो उसके अनुसार गलत काम करते हैं और संस्थागत संतुलन और जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं।

उल्लेखनीय है कि बीसीआई ने राज्य विधिज्ञ परिषद चुनावों के लिए नामांकन शुल्क 5,000 रुपये से बढ़ाकर 1.25 लाख रुपये कर दी। इस फैसले को केरल उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी, जहां न्यायामूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने मामले की सुनवाई करते हुए बीसीआई के खिलाफ आलोचनात्मक मौखिक टिप्पणियां की थी।

मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में बीसीआई ने कहा है कि उसने प्रणाली में कमियों और गलत कामों के बारे में पता होने के बावजूद लगातार संयम से काम लिया है और न्यायपालिका का सम्मान बनाये रखा है। उसने कहा कि ऐसा संयम संस्थागत गरिमा बनाये रखने और वकीलों की चुनी हुई प्रतिनिधि निकायों पर बेवजह हमलों को न्योता देने के लिए किया गया था।

परिषद् ने आगाह किया कि उच्चतम न्यायालय की सीधी निगरानी में चल रही चुनाव प्रक्रिया के दौरान की गयी ऐसी टिप्पणियां अनावश्यक संस्थागत टकराव ला सकती हैं। नामांकन शुल्क के मुद्दे को स्पष्ट करते हुए भारतीय विधिज्ञ परिषद ने कहा कि राज्य विधिज्ञ परिषद के चुनावों के दौरान एकत्र की गयी पूरी राशि विशेष रूप से संबंधित राज्य विधिज्ञ परिषदों के पास ही जमा होती है और बीसीआई इस शुल्क का कोई भी हिस्सा न तो प्राप्त करता है और न ही उससे लाभान्वित होता है।

इसमें कहा गया है कि 1.25 लाख रुपये का नामांकन शुल्क चुनाव रूपरेखा का हिस्सा थी। इसे पहले ही शीर्ष अदालत के सामने रखा जा चुका था और उसने इसकी मंजूरी दे दी थी। पत्र में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए चुनाव कराने में बीसीआई पर पड़ने वाले भारी वित्तीय बोझ पर भी जोर दिया गया। इसमें कहा गया है कि परिषद उच्च-शक्ति प्राप्त चुनाव समितियाँ और पर्यवेक्षी समितियों में काम कर रहे पुराने न्यायाधीशों के आने-जाने, रहने की जगह और मानदेय पर 20 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करती है। ये खर्च पूरी तरह से कानूनी बिरादरी बिना किसी सरकारी या बाहरी मदद के उठाती है।

मुख्य न्यायाधीश से दखल की मांग करते हुए बीसीआई ने सही सलाह या निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है, ताकि यह पक्का हो सके कि चुनाव से जुड़े मामले उच्चतम न्यायालय के बनाये गये खास प्रणाली तक ही सीमित रहें और गैर-जरूरी संस्थागत टकराव को रोकने के लिए न्यायिक रोक लगायी जाए।

 

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