बुधवार को स्विट्जरलैंड के दाओस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच का मंच आमतौर पर वैश्विक सहयोग, मुक्त व्यापार और बहुपक्षीय संवाद का प्रतीक माना जाता है. लेकिन इस बार यही मंच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऐसे बयानों का साक्षी बना, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की आक्रामक और उपनिवेशवादी सोच ने न केवल यूरोप को असहज किया, बल्कि वैश्विक शांति और अंतरराष्ट्रीय नियम आधारित व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए.ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को ‘बर्फ का एक टुकड़ा’ कहना अपने आप में उनकी मानसिकता को उजागर करता है. यह बयान केवल शब्दों की असावधानी नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण का संकेत है, जिसमें भूगोल, जनता और संप्रभुता को महज रणनीतिक संपत्ति की तरह देखा जाता है. ग्रीनलैंड कोई निर्जन जमीन नहीं, बल्कि डेनमार्क के अधीन एक स्वशासी क्षेत्र है, जिसकी अपनी जनता, संस्कृति और राजनीतिक पहचान है. किसी भी लोकतांत्रिक नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संप्रभु राष्ट्रों और क्षेत्रों के प्रति सम्मान का भाव रखे, न कि सौदेबाजी की भाषा बोले. ट्रंप का यह कहना कि वह सैन्य बल का प्रयोग नहीं करेंगे, पहली नजर में आश्वस्त करने वाला लगता है. लेकिन इसी के साथ यह जोड़ देना कि ‘अगर मैं अत्यधिक शक्ति का इस्तेमाल करता तो कोई मुझे रोक नहीं सकता था ‘, असल चिंता की वजह है. यह बयान स्पष्ट करता है कि बल प्रयोग का विकल्प उनके दिमाग में मौजूद है. यही सोच विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है. इतिहास गवाह है कि जब भी किसी महाशक्ति ने अपनी सैन्य क्षमता को नैतिकता से ऊपर रखा है, दुनिया को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है.डेनमार्क को ‘कृतघ्न’ कहना और यह चेतावनी देना कि ‘आप ना कहेंगे तो हम इसे याद रखेंगे ‘, ट्रंप की कूटनीति को व्यापारिक धमकी और राजनीतिक दबाव में बदल देता है. यह भाषा किसी वैश्विक नेता की नहीं, बल्कि किसी दबंग कारोबारी की लगती है. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्मृति के नाम पर प्रतिशोध की धमकी देना बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर करता है और छोटे देशों में असुरक्षा की भावना पैदा करता है.
टैरिफ की धमकी को फिलहाल टाल देना भी किसी उदारता का संकेत नहीं, बल्कि दबाव की रणनीति का हिस्सा है. ट्रंप का रिकॉर्ड बताता है कि आर्थिक हथियार उनके लिए राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने का पसंदीदा साधन रहे हैं. दाओस जैसे मंच पर इस तरह की बयानबाजी यह दर्शाती है कि अमेरिका का नेतृत्व सहयोग से ज्यादा नियंत्रण और प्रभुत्व की भाषा बोल रहा है. ग्रीनलैंड को बार-बार आइसलैंड कह देना भले ही सोशल मीडिया के लिए मीम्स का विषय बन गया हो, लेकिन यह भी इस बात का प्रतीक है कि ट्रंप जैसे नेता जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को कितनी सतही समझ के साथ देखते हैं. जब ऐसी समझ के साथ दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति का नेतृत्व किया जाए, तो खतरा स्वाभाविक है. दरअसल,आज दुनिया पहले ही यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अनिश्चितताओं से जूझ रही है. ऐसे समय में ट्रंप की यह बयानबाजी वैश्विक शांति के लिए नई चुनौतियां खड़ी करती है. ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल एक द्वीप का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो ताकत को अधिकार समझती है. यदि यही सोच वैश्विक नेतृत्व की दिशा तय करेगी, तो आने वाले वर्षों में दुनिया और अधिक अस्थिर, असुरक्षित और विभाजित होती दिखाई देगी.
