भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यों की वित्तीय स्थिति केवल लेखा-जोखा भर नहीं है, बल्कि यह विकास की गति, सामाजिक स्थिरता और राजनीतिक परिपक्वता का भी आईना है. वर्ष 2025-26 के बजट अनुमानों और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की स्टेट फाइनेंस ; ए स्टडी ऑ$फ बजेट्स रिपोर्ट यह स्पष्ट संकेत देती है कि राज्यों की वित्तीय सेहत एक जटिल मोड़ पर खड़ी है.आरबीआई के अनुसार, वर्ष 2024-25 में राज्यों का सकल राजकोषीय घाटा (जीएफडी) सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 3.1फीसदी रहा, जबकि 2025-26 के लिए इसे 2.8-3.0 फीसदी के बीच रखने का लक्ष्य है. यह आंकड़ा सतही तौर पर संतोषजनक दिखता है, लेकिन इसके भीतर छिपी असमानताएं चिंता पैदा करती हैं. कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जहां पूंजीगत व्यय बढ़ाकर दीर्घकालिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वहीं कई राज्य लोकलुभावन योजनाओं के बोझ से जूझते दिखाई देते हैं.
एक बड़ा प्रश्न राजस्व बनाम व्यय संरचना का है. राज्यों की कुल आय में जीएसटी का हिस्सा 30-35 फीसदी तक है, लेकिन जीएसटी क्षतिपूर्ति समाप्त होने के बाद कई राज्यों की राजस्व वृद्धि धीमी हुई है. इसके परिणामस्वरूप, वे उधारी पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं. आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि राज्यों का कुल कर्ज जीडीपी का लगभग 31 फीसदी है. यद्यपि यह स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के लिहाज से असहज नहीं है, लेकिन यदि कर्ज का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे राजस्व व्यय में जा रहा हो, तो यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.
लोकलुभावन योजनाओं की राजनीति इस बहस के केंद्र में है. मुफ्त बिजली, मुफ्त परिवहन, नकद हस्तांतरण और कृषि सब्सिडी जैसी योजनाएं अल्पकाल में सामाजिक राहत देती हैं, लेकिन दीर्घकाल में राजकोषीय दबाव बढ़ाती हैं. उदाहरण के तौर पर, कुछ राज्यों में राजस्व व्यय का 20-25 फीसदी केवल सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं पर खर्च हो रहा है. सवाल यह नहीं है कि कल्याणकारी योजनाएं हों या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उनके लिए स्थायी वित्तीय स्रोत मौजूद हैं.
सकारात्मक पहलू यह है कि कई राज्यों ने हाल के वर्षों में पूंजीगत व्यय में 15-18 फीसदी की औसत वृद्धि दर्ज की है. सडक़, बिजली, जल आपूर्ति और शहरी अवसंरचना में निवेश से ‘क्राउडिंग-इन’ प्रभाव पैदा हो रहा है, जिससे निजी निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है. केंद्र सरकार द्वारा विशेष सहायता और ब्याज मुक्त ऋण भी इस दिशा में सहायक रहे हैं. बहरहाल,आगे की राह दरअसल,संतुलन की मांग करती है. राज्यों को तीन मोर्चों पर एकसाथ काम करना होगा. पहला, राजस्व आधार का विस्तार, जिसमें संपत्ति कर, उपयोगकर्ता शुल्क और गैर-कर राजस्व की भूमिका बढ़े. दूसरा, व्यय की गुणवत्ता, जहां मुफ्त योजनाओं की जगह लक्षित और परिणाम आधारित खर्च को प्राथमिकता दी जाए. तीसरा, राजकोषीय पारदर्शिता, ताकि बजट के बाहर के कर्ज और गारंटियों पर स्पष्ट निगरानी हो. कुल मिलाकर राज्यों की वित्तीय सेहत न तो पूरी तरह संकट में है और न ही निश्चिंतता के क्षेत्र में. यह एक ऐसा संक्रमण काल है, जहां विवेकपूर्ण नीति, आंकड़ों पर आधारित निर्णय और राजनीतिक संयम ही भारत के संघीय ढांचे को दीर्घकालिक मजबूती दे सकते हैं.
