नई दिल्ली | 15 जनवरी, 2026: संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लागू किए गए विवादास्पद ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ पर अपना निर्णय एक बार फिर सुरक्षित रख लिया है। यह लगातार दूसरी बार है जब अदालत ने इस बड़े आर्थिक मामले पर फैसला आगे बढ़ाया है। ट्रंप प्रशासन ने 1977 के ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) का उपयोग करते हुए व्यापारिक साझेदारों पर 10% से 50% तक का आयात शुल्क लगा दिया था। राष्ट्रपति का तर्क है कि देश का बढ़ता व्यापार घाटा और नशीले पदार्थों की तस्करी एक ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ है, जबकि विरोधियों का कहना है कि व्यापार नीति बदलने का संवैधानिक अधिकार राष्ट्रपति के बजाय अमेरिकी कांग्रेस के पास है।
इस फैसले के टलने से वैश्विक व्यापारिक जगत में भारी चिंता देखी जा रही है। यदि सुप्रीम कोर्ट इन टैरिफों को अवैध घोषित करता है, तो अमेरिकी सरकार को अब तक वसूले गए करीब 150 अरब डॉलर की ड्यूटी व्यापारियों को लौटानी पड़ सकती है। खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी है कि सरकार की हार एक ‘आर्थिक आपदा’ के समान होगी। 12 डेमोक्रेट-शासित राज्यों के कारोबारियों ने इस नीति को चुनौती देते हुए तर्क दिया है कि आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर पूरी व्यापार व्यवस्था को बदलना असंवैधानिक है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव हिल सकती है।
निचली फेडरल अदालतें पहले ही ट्रंप सरकार के कई टैरिफ प्रस्तावों को अवैध करार दे चुकी हैं, जिससे सुप्रीम कोर्ट के अंतिम रुख पर सबकी नजरें टिकी हैं। फिलहाल अदालत ने अगली सुनवाई या फैसले की कोई निश्चित तारीख तय नहीं की है, जिससे निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के बीच अनिश्चितता और बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत सहित उन सभी देशों के निर्यात पर असर डाल रही है जो अमेरिका के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं। यदि यह टैरिफ युद्ध जारी रहता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में बड़े व्यवधान की आशंका है।

