नई दिल्ली | 13 जनवरी, 2026: निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है। बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में विपक्ष द्वारा इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने के बाद मामला देश की शीर्ष अदालत पहुँचा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ इस बात पर विचार करेगी कि क्या चुनाव आयोग का यह कदम नागरिकों के मतदान के अधिकार का उल्लंघन है या यह उसकी वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इस मामले में नागरिकता की पहचान और डेटा सुरक्षा से जुड़े कई जटिल कानूनी मुद्दे भी शामिल हैं।
पिछली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसे मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाए रखने का पूर्ण अधिकार है। आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि भारत का लोकतंत्र केवल वैध नागरिकों के लिए है, इसलिए यह सुनिश्चित करना आयोग का प्राथमिक कर्तव्य है कि किसी भी विदेशी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में शामिल न हो। आयोग ने तर्क दिया कि चूंकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदों के लिए भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है, इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता से समझौता नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों द्वारा लगाए जा रहे भेदभाव के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग ने कोर्ट में कहा कि वह किसी भी राजनीतिक बयानबाजी पर प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य नहीं है, बल्कि उसका मूल दायित्व केवल पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराना है। मंगलवार की सुनवाई में आयोग उन मानदंडों को भी प्रस्तुत कर सकता है जिनके आधार पर संदिग्ध मतदाताओं की पहचान की जा रही है। इस सुनवाई के नतीजे आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी की दिशा तय करेंगे, जिससे देश भर के राजनीतिक गलियारों में इस मामले को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।

