एससी, एसटी आरक्षण में से ‘क्रीमी लेयर’ को हटाने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, 12 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को दिये जाने वाले आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ सिद्धांत लागू करने के मुद्दे पर सुनवाई के लिये सोमवार को हामी भरी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एससी/एसटी आरक्षण से संपन्न वर्गों को हटाने की मांग करने वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गयी याचिका कहती है कि संपन्न वर्गों को एसटी/एससी कोटा के तहत आरक्षण देना संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17, 38, 41, 46, 51ए(जे) और 335 का उल्लंघन है।

याचिका में कहा गया कि एससी/एसटी समाज के संपन्न और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके परिवार प्रतियोगी परिक्षाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षित सीटों का एक हिस्सा अपने पास रख रहे हैं, जिसकी वजह से यह आरक्षण इसके सही हकदारों तक नहीं पहुंच रहा।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें याचिका की ज़रूरत एक दिसंबर 2025 को महसूस हुई जब यह बात सामने आयी कि एससी/एसटी श्रेणी में क्रीमी लेयर से आने वाले लोग केंद्रीय और राज्य प्रशासनिक सेवाओं के अलावा जेईई, नीट, क्लैट और कैट जैसी प्रवेश परिक्षाओं में भी आरक्षण का फायदा उठा रहे थे।

याचिकाकर्ता ने यह दलील दी कि संविधान निर्माताओं ने आरक्षण का प्रावधान सामाजिक-आर्थिक न्याय के इरादे से डाला था, न कि एक स्थायी हक के तौर पर। याचिका में कहा गया कि सामयिक विश्लेषण और क्रीमी लेयर को हटाये बिना अत्यधिक आरक्षण देना न्याय, समता और समान अवसर के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।

संविधान सभा की बहसों और डॉ. भीमराव अंबेडकर, वी.आई. मुनिस्वामी पिल्लई और जयपाल सिंह के भाषणों पर भरोसा करते हुए, याचिका में संविधान की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या करने का आग्रह किया गया है। इसमें कहा गया है कि आरक्षण विकास और समानता हासिल करने का एक साधन हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में एक लक्ष्य नहीं बन सकता क्योंकि आर्थिक दक्षता, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव संवैधानिक शासन के लिए ज़रूरी हैं।

याचिका मौजूदा आरक्षण ढांचे के प्रभाव को राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों में बांटती है। इसमें आरोप लगाया गया है कि संपन्न वर्गों को आरक्षितों से न हटाने के कारण एससी/एसटी समुदायों में “कुलीनों ने कब्जा” कर लिया है, जिससे “जाति के अंदर एक वर्ग” बन गया है। यहां लाभ परिवारों के एक सीमित समूह के बीच घूमता रहता है। याचिका का दावा है कि यह असली सशक्तिकरण को कमजोर करता है और समावेशी विकास के बजाय पहचान-आधारित राजनीति को बढ़ावा देता है।

 

 

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